अपराधिक मामले की जानकारी देने से नहीं मिलता नियुक्ति का अधिकार
.00 पुलिस एक अनुशासित बल है, नियुक्ति के समय उम्मीदवार के चरित्र और पिछले रिकॉर्ड की पूरी जांच जरूरी
० हाईकोर्ट ने दिए 60 दिन में निर्णय का निर्देश
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कांस्टेबल (जीडी) पद पर नियुक्ति के मामले में कहा है कि, आपराधिक मामला लंबित होना हर स्थिति में स्वतः अयोग्यता नहीं है, लेकिन केवल मामले की जानकारी देने से उम्मीदवार को नियुक्ति का अधिकार भी नहीं मिल जाता। कोर्ट ने सक्षम अथॉरिटी को उम्मीदवार की पूरी आपराधिक पृष्ठभूमि की जांच कर कानून के अनुसार निर्णय लेने का निर्देश दिया है।
नरेंद्र पाल बर्मन ने बलौदाबाजार-भाटापारा जिला पुलिस में कांस्टेबल (जीडी) पद के लिए भर्ती प्रक्रिया में हिस्सा लिया था* शारीरिक दक्षता और लिखित परीक्षा में सफल होने के बाद अनुसूचित जाति वर्ग की वेटिंग लिस्ट में वह प्रथम स्थान पर था* आगे की प्रक्रिया में उसने अटेस्टेशन फॉर्म सहित दस्तावेज जमा किए और अपने खिलाफ दर्ज दो एफआईआर की जानकारी दी* याचिकाकर्ता के अनुसार क्राइम नंबर 431/2022 में आईपीसी की धारा 147, 148, 149, 186, 307, 332, 341, 353, 427 व 120-बी तथा क्राइम नंबर 223/2023 में धारा 186, 294, 34 व 506 के मामले लंबित हैं* उसकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी ने अवतार सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के फैसले का हवाला देते हुए नियुक्ति पर विचार की मांग की।
10 आपराधिक मामले
राज्य की ओर से जीए अनिल एस. पांडे ने बताया कि,याचिकाकर्ता के खिलाफ दो नहीं, बल्कि कुल 10 आपराधिक मामले हैं और इनमें धारा 307 जैसे गंभीर आरोप भी शामिल हैं। राज्य ने कहा कि, पूरी आपराधिक पृष्ठभूमि का खुलासा नहीं करना उसकी नियुक्ति की उपयुक्तता पर विचार करते समय महत्वपूर्ण है। केवल वेटिंग लिस्ट में नाम होने से नियुक्ति का अधिकार नहीं मिलता। कोर्ट ने कहा कि पुलिस एक अनुशासित बल है, इसलिए नियुक्ति के समय उम्मीदवार के चरित्र और पिछले रिकॉर्ड की पूरी जांच जरूरी है। सक्षम अथॉरिटी को आरोपों की प्रकृति, गंभीरता, मामलों की स्थिति, उम्मीदवार द्वारा किए गए खुलासे और अन्य संबंधित तथ्यों पर विचार करना होगा।
याचिकाकर्ता की एलिजिबिलटी पर राय नहीं
हाईकोर्ट ने सक्षम अथॉरिटी/स्क्रीनिंग कमेटी को सभी आपराधिक मामलों की जानकारी सत्यापित कर याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी पर कानून के अनुसार निर्णय लेने का निर्देश दिया* आदेश की प्रति मिलने से 60 दिन के भीतर तर्कपूर्ण आदेश पारित करने को कहा गया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने नियुक्ति के लिए याचिकाकर्ता की अंतिम उपयुक्तता पर कोई राय नहीं दी है।

kamlesh Sharma

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