अवैध गर्भपात मामले में दो डॉक्टर व महिला दोषी
० हाईकोर्ट में सजा पर सुनवाई 12 अक्टूबर को
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अवैध गर्भपात से जुड़े वर्ष 2011 के मामले में कटघोरा के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा आरोपियों को बरी करने के फैसले को आंशिक रूप से पलट दिया है। जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास ने छत्तीसगढ़ राज्य विरुद्ध डॉ. राजेंद्र प्रसाद रविदास व अन्य मामले में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 की धारा 5 और आईपीसी की धारा 315 के तहत आरोपियों को बरी करने का फैसला निरस्त करते हुए अभियोजन को इन धाराओं के तहत आरोप साबित करने योग्य माना। पीसी एंड पीएनडीटी एक्ट की धारा 22(3) के तहत बरी किए जाने के फैसले को बरकरार रखा है।
अभियोजन के अनुसार 5 अगस्त 2011 को ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर, कटघोरा ने अस्पताल में अवैध गर्भपात संबंधी गतिविधियों की जांच के लिए पुलिस को पत्र दिया था। 7 अगस्त 2011 को स्वास्थ्य विभाग की टीम ने लाइफकेयर अस्पताल, दीपका का निरीक्षण किया, जहां ऑपरेशन थिएटर में आपत्तिजनक उपकरण तथा 16 से 32 सप्ताह की अलग-अलग उम्र के भ्रूण मिलने का उल्लेख निरीक्षण रिपोर्ट में किया गया* इसके आधार पर दीपका पुलिस ने अपराध दर्ज किया* जांच के बाद आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, कटघोरा के समक्ष पेश किया गया, जहां से मामला सत्र न्यायालय को भेजा गया* 31 अगस्त 2016 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, कटघोरा ने आरोपियों को बरी कर दिया था।
मामले में राज्य की ओर से तर्क दिया गया कि डॉ. दिनेश चौहान डॉ. पी.आर. कुंभकार डॉ. भुनेश्वर सिंह कंवर डॉ. एच.डी. डाहिरे और डॉ. अशोक मखीजा के बयानों से अवैध गर्भपात, दवाओं तथा उपकरणों के इस्तेमाल संबंधी तथ्य साबित होते हैं* अभियोजन ने 18 गवाहों से पूछताछ और 27 दस्तावेज पेश किए थे, जबकि बचाव पक्ष ने छह दस्तावेज पेश किए तथा डॉ. मिथिलेश प्रसाद ने बचाव साक्षी के रूप में बयान दिया* बचाव पक्ष ने गवाहों के बयानों में विरोधाभास और कमियों का हवाला देते हुए ट्रायल कोर्ट के बरी करने के फैसले को सही बताया*
हाईकोर्ट ने पीसी एंड पीएनडीटी एक्ट के प्रावधानों पर विचार करते हुए कहा कि यह कानून प्रसवपूर्व निदान तकनीक के दुरुपयोग और भ्रूण के लिंग चयन को रोकने के उद्देश्य से बनाया गया है। हालांकि, कोर्ट ने पीसी एंड पीएनडीटी एक्ट की धारा 22(3) के तहत आरोप साबित नहीं होने के कारण इस हिस्से में ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा,वहीं एमटीपी एक्ट की धारा 5 और आईपीसी की धारा 315 के संबंध में हाईकोर्ट ने कहा कि, रिकॉर्ड में भ्रूण की मौजूदगी और उसकी उम्र से संबंधित तथ्य थे तथा आरोपी यह स्पष्ट नहीं कर सके कि गर्भपात मां की जान बचाने के लिए सद्भावना में किया गया था* कोर्ट ने इसी आधार पर इन दोनों धाराओं के तहत बरी किए जाने का फैसला निरस्त कर दिया।
जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास ने राज्य की अपील को आंशिक रूप से मंजूर करते हुए डॉ. राजेंद्र प्रसाद रविदास, डॉ. मिथिलेश प्रसाद और श्रीमती रेणु श्रीवास्तव के खिलाफ एमटीपी एक्ट की धारा 5 और आईपीसी की धारा 315 के आरोपों में बरी किए जाने का निर्णय पलट दिया, जबकि पीसी एंड पीएनडीटी एक्ट की धारा 22(3) के संबंध में बरी किए जाने की पुष्टि की* कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 235(2) बीएनएसएस की धारा 254(2) के तहत सजा के प्रश्न पर आरोपियों को सुनवाई का अवसर देने के लिए मामला 12 अक्टूबर 2026 को सूचीबद्ध किया है*
