सज़ा का मकसद अपराध को रोकने एक असरदार रोकथाम बनाना है-हाईकोर्ट
०० 25 साल पहले किया अपराध अब जेल जाना पड़ेगा
बिलासपुर। प्राण घातक हमला करने के आरोपी 25 वर्ष बाद भी जेल जाने की सजा नहीं बच सका। हाईकोर्ट ने आरोपी की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए 25 वर्ष पुराना मामला होने पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायदृष्टांत का हवला देते हुए कहा कि सज़ा का मकसद एक असरदार रोकथाम बनाना है ताकि भविष्य में ऐसे ही क्राइम/कार्रवाइयों को रोका जा सके और कम किया जा सके। सज़ा देते समय ध्यान में रखने वाली बात यह है कि सज़ा बहुत ज़्यादा सख़्त न हो, लेकिन साथ ही, यह इतनी हल्की भी न हो कि इसका रोकथाम वाला असर कम हो जाए। इसके साथ अपील करने वाले को चार माह कैद की सजा सुनाई। कोर्ट ने उसके जेल में निरूद्ब समय को सजा में समायोजित करने का निर्देश दिया है।
अपीलकर्ता गुरु उर्फ राहुल उर्फ प्रवीण कुमार शिदे पिता हुलास राव,उम्र 26 वर्ष निवासी बांसपारा धमतरी, पी.एस. सिटी कोटतवाली धमतरी का 3 दिसंबर 2002 को दीपक कुमार ओझा के साथ झगड़ा हुआ था। झगड़े के बाद, जब दीपक ओझा अपने घर जा रहा था और वह अपने घर के सामने पहुँचा, तो आरोपी मोटरसाइकिल पर वहाँ पहुँचा और उसके साथ दो और लोग थे, जिन्होंने पीड़ित पर तलवार से हमला किया, जिसका मकसद उसे जान से मारना था। पीड़ित ने खुद को हमले से बचाने के लिए अपने हाथ से हमले को रोका और उसकी कोहनी में गंभीर चोट आई और फ्रैक्चर भी हो गया। घायल के रिपोर्ट पर धमतरी कोतवाली पुलिस ने धारा 307/34 के तहत अपराध पंजीबद्ब कर सीजेएम कोर्ट में चालान पेश किया। सीजेएम कोर्ट ने मामले को विचारण के लिए रायपुर जिला एवं सत्र न्यायालय भ्ोजा। सुनवाई उपरांत ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दो वर्ष कैद एवं 500 रू अर्थदंड की सजा सुनाई।
सजा के खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील पेश की थी। अपील में कहा गया कि उसने जमानत में मिली आजादी का गलत इस्तमाल नहीं किया है। पिछले 25 वर्ष से हर सुनवाई में उपस्थित हो रहा है। इस आधार पर सजा में छूट देने अनुरोध किया गया। जस्टिस नरेन्द्र कुमार व्यास ने सुनवाई में पाया कि अपराध गंभीर था। इस कारण से आरोपी की कैद की सजा से छूट देने पेश आवेदन को खारिज किया। कोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के न्यायदृष्टांत का उल्लेख करते हुए कहा कि सज़ा का मकसद एक असरदार रोकथाम बनाना है ताकि भविष्य में ऐसे ही क्राइम/कार्रवाइयों को रोका जा सके और कम किया जा सके। सज़ा देते समय ध्यान में रखने वाली बात यह है कि सज़ा बहुत ज़्यादा सख़्त न हो, लेकिन साथ ही, यह इतनी हल्की भी न हो कि इसका रोकथाम वाला असर कम हो जाए। कोर्ट ने कहा फैक्ट्स और कानून को देखते हुए, यह बिल्कुल साफ है कि जिस तरह से अपील करने वाले ने जुर्म किया है, उसके लिए सज़ा को पहले से काटी गई अवधि तक कम करने की अर्जी पर विचार नहीं किया जा सकता और इसलिए, इसे रिजेक्ट किया जाता है। लेकिन, यह देखते हुए कि
घटना साल 2002 की है और 25 साल से ज़्यादा समय बीत चुका है, और अपील करने वाले का कोई पिछला क्रिमिनल रिकॉर्ड नहीं है क्योंकि अभियोजन ने अपील करने वाले का कोई क्रिमिनल गतिविधि रिकॉर्ड में नहीं ला पाया है, उसने ट्रायल के दौरान और अपील के पेंडिग रहने के दौरान भी उसे मिली बेल की आज़ादी का गलत इस्तेमाल नहीं किया है, इसलिए आईपीसी के सेक्शन 326 के तहत जुर्म के लिए सज़ा को घटाकर 04 महीने किया जा सकता है, जिसमें से वह आईपीसी के सेक्शन 428 / भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के सेक्शन 468 के प्रोविज़न के अनुसार ट्रायल के दौरान जेल में रहने के कारण एक महीने और 10 दिन का सेट ऑफ़ पाने का हकदार है। इस अपील को कुछ हद तक मंज़ूरी दी जाती है। कोर्ट ने उसका बेल बॉन्ड कैंसल करते हुए अपील करने वाले को 30 सितंबर, 2026 को ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करने का निर्देश दिया है ताकि वह इस कोर्ट द्बारा दी गई सज़ा का बचा हुआ हिस्सा काट सके, अगर अपील करने वाला ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करने में फ़ेल रहता है, तो पुलिस अधिकारियों को उसके खिलाफ एक्शन लेने और इस कोर्ट को एक कम्प्लायंस रिपोर्ट भ्ोजने का निर्देश दिया है।
