अनचाही गर्भावस्था को जारी रखने के लिए मजबूर करना पीड़िता के शारीरिक स्वतंत्रता अधिकार का उल्लंघन होगा-हाई कोर्ट
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने नाबालिग अवस्था में रेप की शिकार हुई पीड़िता की करीब 25 सप्ताह 5 दिन की गर्भावस्था के मेडिकल टर्मिनेशन की अनुमति दी है। कोर्ट ने कहा कि अनचाही गर्भावस्था को जारी रखने के लिए मजबूर करना पीड़िता के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सम्मान, निजता, शारीरिक स्वतंत्रता और प्रजनन संबंधी निर्णय लेने के अधिकार का उल्लंघन होगा।
पीड़िता ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दायर कर गर्भावस्था समाप्त करने के लिए आवश्यक निर्देश देने की मांग की थी। उसका कहना था कि नाबालिग रहते हुए उसके साथ हुए यौन अपराध के कारण वह गर्भवती हुई है और गर्भावस्था जारी रहने से उसे गंभीर मानसिक आघात एवं मनोवैज्ञानिक परेशानी का सामना करना पड़ेगा।15 जुलाई 2026 को हाईकोर्ट ने CMHO रायपुर को मेडिकल बोर्ड गठित कर पीड़िता की शारीरिक एवं मानसिक स्थिति, गर्भ की अवधि, भ्रूण की स्थिति और गर्भावस्था समाप्त करने की मेडिकल प्रेक्टिकलटी का आकलन करने का निर्देश दिया था। मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में गर्भावस्था : अवधि करीब 25 सप्ताह 5 दिन बताई। पीड़िता का हीमोग्लोबिन 8.7 ग्राम/डीएल पाया गया, जबकि भ्रूण में कोई बड़ी असामान्यता नहीं मिली। बोर्ड ने गर्भावस्था की अधिक अवधि और एमटीपी एक्ट के प्रावधानों को देखते हुए टर्मिनेशन की अनुमति नहीं देने की राय दी थी।
मामले की सुनवाई के बाद जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने कहा कि सोनोग्राफी से निर्धारित गर्भावस्था की अवधि अनुमानित होती है और इसमें स्वीकार्य अंतर हो सकता है। कोर्ट ने कहा कि इस मामले के विशेष तथ्यों में गर्भावस्था समाप्त करने से इनकार करना पीड़िता के मौलिक अधिकारों का निरंतर उल्लंघन होगा। कोर्ट ने उसकी शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक भलाई को देखते हुए याचिका स्वीकार कर ली।कोर्ट ने CMHO रायपुर को आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के 24 घंटे के भीतर पीड़िता को डॉ. भीमराव अंबेडकर मेमोरियल अस्पताल या आवश्यक सुविधाओं वाले किसी अन्य सरकारी टर्शियरी केयर अस्पताल में भर्ती कराने का निर्देश दिया। प्रक्रिया विशेषज्ञ डॉक्टरों की म सिप्लिनरी टीम द्वारा कानून और मेडिकल के अनुसार की जाएगी।कोर्ट ने पीड़िता के एनीमिया को देखते हुए पर्याप्त रक्त एवं रक्त घटकों की व्यवस्था, इंटेंसिव केयर और आपात चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध रखने के निर्देश दिए हैं। साथ ही उसे आवश्यक चिकित्सा देखभाल, काउंसलिंग और मनोवैज्ञानिक सहयोग देने तथा उसकी पहचान और मेडिकल रिकॉर्ड की गोपनीयता बनाए रखने को कहा है।
चूंकि विधानसभा थाना, रायपुर में POCSO एक्ट एवं अन्य धाराओं के तहत दर्ज अपराध की जांच/ट्रायल चल रहा है, इसलिए कोर्ट ने भ्रूण के ऊतक, प्लेसेंटा, रक्त, डीएनए और अन्य जैविक नमूनों को फोरेंसिक प्रोटोकॉल के अनुसार सुरक्षित रखने का निर्देश दिया है* CMHO को पूरी प्रक्रिया की निगरानी कर अनुपालन रिपोर्ट हाईकोर्ट में प्रस्तुत करने को कहा गया है।
