कोटवारी भूमि पर कोटवार या उसके वारिसों के हक में मान्यता नहीं दी जा सकती-हाई कोर्ट
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की सवैधानिक पीठ ने कोटवारी भूमि के स्वामित्व को लेकर उत्पन्न हुए वाद बिंदु पर निर्णय पारित किया है। कोर्ट ने आदेश में कहा यह साफ़ है कि एबोलिशन एक्ट, 1950 के लागू होने के बाद मालगुज़ारों, प्रोपराइटरों वगैरह के नाम पर मौजूद सारी जायदाद राज्य को ट्रांसफर कर दी गई है और इसी तरह जिन मालगुज़ारों, प्रोपराइटरों ने 1950 से पहले अपनी ज़मीन कोटवार कहे जाने वाले लोगों को गाँव की सेवा करने के लिए ट्रांसफर कर दी थी, वह भी राज्य को ट्रांसफर कर दी गई है। एबोलिशन एक्ट, 1950 के लागू होने के बाद राज्य और कोटवारों के बीच मालिक-नौकर का रिश्ता जारी रहा। इसके अलावा, लैंड रेवेन्यू कोड, 1959 के सेक्शन 183 को देखने पर यह साफ़ है कि कोटवारों को ज़मीन इस शर्त पर मिलती है कि वे गाँव के नौकर के तौर पर काम करेंगे और कोटवार के पद से इस्तीफ़ा देने या कानूनी तौर पर हटाए जाने के बाद वह ऐसी ज़मीन का हक़दार नहीं रहेगा और ज़मीन उसके बाद आने वाले को मिल जाएगी। चरण दास के मामले में यह माना गया है कि किसी व्यक्ति को भूमिस्वामी अधिकार देने से पहले यह जाँच होनी चाहिए कि ऐसी ज़मीन कैसे ट्रांसफर हुई और क्या ऐसे ट्रांसफर को राज्य ने मान्यता दी है। इसके अलावा, यह भी माना गया है कि अगर कोई सर्विस लैंड है जिसे कोटवार के नाम पर सेटल करने का निर्देश दिया गया है क्योंकि वह गाँव के लिए अपनी सर्विस दे रहा था, तो ऐसे मामलों में प्रॉपर्टी को ऐसे कोटवार की भूमिस्वामी ज़मीन घोषित नहीं किया जा सकता। ऊपर की चर्चा को देखते हुए, विद्वान सिंगल जज द्वारा इस बेंच को दिए गए रेफरेंस का जवाब ‘नहीं’ में दिया जाता है। रजिस्ट्री को इन पिटीशन को मेरिट के आधार पर तय करने के लिए रोस्टर वाली बेंच के सामने लिस्ट करने का निर्देश दिया जाता है। मालिकाना हक खत्म होने से पहले कोटवार को सर्विस देने के लिए दी गई सर्विस लैंड को M.P./C.G. लैंड रेवेन्यू कोड, 1959 और M.P. के प्रोविज़न के तहत ऐसे कोटवार या उसके वारिसों के हक में मान्यता नहीं दी जा सकती और न ही उसे भूमिस्वामी राइट्स में बदला जा सकता है।
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उल्लेखनीय है कि कोटवारी भूमि में मालिकाना हक की मांग को लेकर अलग अलग याचिका पेश की गई है। एकलपीठ ने इस वाद बिंदु को फूल बेंच के समक्ष निर्णय के लिए भेजने का निर्देश दिया था। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा, जस्टिस रविन्द्र कुमार अग्रवाल व जस्टिस बीड़ी गुरु की संवैधानिक पीठ ने उक्त आदेश पारित किया है।

