भ्रष्टाचार के मामले में मौत के बाद बरी हुए सब-रजिस्ट्रार
० आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा अभियोजन
बिलासपुर। हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के मामले में दोषी ठहराए गए तत्कालीन दुर्ग सब-रजिस्ट्रार आरके नेताम की सजा और दोषसिद्धि रद्द कर दी है। जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल ने मंगलवार को फैसला सुनाते हुए कहा कि, अभियोजन पक्ष नेताम के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। नेताम की अपील लंबित रहने के दौरान 23 जुलाई 2022 को मृत्यु हो गई थी। इसके बाद उनकी पत्नी सुनीता नेताम को सीआरपीसी की धारा 394(2) के तहत अपील जारी रखने की अनुमति 1 अप्रैल 2026 को दी गई थी।
अभियोजन के अनुसार, गोपाल कृष्ण अग्रवाल ने 9 फरवरी 2006 को एंटी करप्शन ब्यूरो में शिकायत की थी कि, उनकी बहन आशा लता उर्फ आशा रानी की पुलगांव, दुर्ग में करीब 27.3 एकड़ जमीन थी। आरोप था कि,निर्मला देवी अग्रवाल ने अमेरिका में तैयार कथित पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर जमीन की अलग-अलग सेल डीड कराईं। तत्कालीन सब-रजिस्ट्रार आरके नेताम पर आरोप था कि, पावर ऑफ अटॉर्नी पर आवश्यक स्टांप ड्यूटी जमा नहीं होने के बावजूद उन्होंने उसके आधार पर सेल डीड रजिस्टर्ड कीं। अभियोजन ने इससे शासन को 6,08,115 रुपये की स्टांप ड्यूटी का नुकसान होने का आरोप लगाया था।
मामले में नेताम के खिलाफ आईपीसी की धारा 420, 120-बी तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13(1)(डी) और 13(2) के तहत आरोप तय किए गए थे। हाईकोर्ट ने कहा कि,नेताम और निर्मला देवी अग्रवाल के बीच किसी पूर्व समझौते, बातचीत, पैसे के लेन-देन, लाभ पहुंचाने या आपराधिक साजिश का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिला। कई अभियोजन गवाह भी अभियोजन के पक्ष का समर्थन नहीं कर सके। जांच अधिकारी ने स्वीकार किया कि जमीन मालिक और कुछ महत्वपूर्ण गवाहों के बयान दर्ज नहीं किए गए तथा मूल पावर ऑफ अटॉर्नी भी जब्त नहीं हुई थी।
आपराधिक साजिश या धोखाधड़ी साबित नहीं
कोर्ट ने यह भी पाया कि,अभियोजन के गवाह रोमनाथ साहू ने पावर ऑफ अटॉर्नी स्वयं देखने से इनकार किया और स्टांप ड्यूटी की वास्तविक राशि या शासन को हुए वास्तविक नुकसान के बारे में भी स्पष्ट जानकारी नहीं दी। हाईकोर्ट ने कहा कि, दस्तावेज की जांच में कथित चूक या प्रशासनिक लापरवाही को, बिना अतिरिक्त ठोस साक्ष्य के, भ्रष्टाचार अधिनियम के तहत आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता। केवल सेल डीड का पंजीयन अपने आप में आपराधिक साजिश या धोखाधड़ी साबित नहीं करता। अदालत ने कहा कि, आपराधिक न्यायशास्त्र में संदेह, चाहे कितना भी मजबूत हो, सबूत का स्थान नहीं ले सकता। अभियोजन नेताम के खिलाफ आरोप संदेह से परे साबित करने में असफल रहा है। इसके आधार पर कोर्ट ने उनकी दोषसिद्धि और सजा का फैसला निरस्त करते हुए उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया। अपील में सुनीता नेताम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एचबी अग्रवाल ने पैरवी की* कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का रिकॉर्ड और आदेश की प्रति संबंधित न्यायालय को भेजने का निर्देश दिया।
