नो वर्क, नो पे” का सिद्धांत हर मामले में लागू नहीं होता0 वंचित कर्मचारी को 50 प्रतिशत एरियर्स चार माह के भीतर अदा करें
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि “नो वर्क, नो पे” (काम नहीं तो वेतन नहीं) का सिद्धांत हर मामले में स्वतः लागू नहीं होता* यदि किसी कर्मचारी को विभागीय लापरवाही या प्रशासनिक निष्क्रियता के कारण पदोन्नति का लाभ समय पर नहीं मिल पाता, तो उसे पूरी तरह वेतन लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता*कोर्ट ने यह फैसला सेवानिवृत्त सहायक आयुक्त जी.आर. साहू द्वारा दायर याचिका पर सुनाया * याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि, वे अपने जूनियर अधिकारियों से वरिष्ठ होने के बावजूद उन्हें समय पर डिप्टी कमिश्नर पद पर पदोन्नति नहीं दी गई, जबकि उनके जूनियर अधिकारियों को वर्ष 2011 में ही पदोन्नत कर दिया गया थामामले की सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि समीक्षा विभागीय पदोन्नति समिति (रिव्यू डीपीसी) ने याचिकाकर्ता को पदोन्नति के लिए उपयुक्त पाया था और उन्हें उनके जूनियर अधिकारियों से ऊपर रखने की अनुशंसा भी की थी इसके बावजूद विभाग ने लंबे समय तक कोई कार्रवाई नहीं की* याचिकाकर्ता ने कई बार प्रतिवेदन दिए और न्यायालय की शरण भी ली, लेकिन समय पर पदोन्नति नहीं मिल सकी* बाद में वर्ष 2019 में उन्हें 13 जुलाई 2011 से काल्पनिक (नोटेशनल) पदोन्नति प्रदान की गई*विभाग की गलती के कारण अवसर नहीं मिलामामले में मुख्य विवाद यह था कि 13 जुलाई 2011 से 31 दिसंबर 2016 (सेवानिवृत्ति तिथि) तक की अवधि के लिए याचिकाकर्ता को पदोन्नत पद का वेतन लाभ दिया जाए या नहींराज्य सरकार ने “नो वर्क, नो पे” का सिद्धांत लागू करने का तर्क दिया, जबकि याचिकाकर्ता का कहना था कि उन्हें विभाग की गलती के कारण पदोन्नत पद पर कार्य करने का अवसर ही नहीं मिला न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास ने अपने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता पदोन्नत पद पर कार्य नहीं कर पाए, लेकिन इसके वे स्वयं जिम्मेदार नहीं थे* विभागीय निष्क्रियता के कारण उन्हें पदोन्नति से वंचित रखा गया* ऐसे मामलों में “नो वर्क, नो पे” का सिद्धांत यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता*6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देयहालांकि न्यायालय ने यह भी माना कि, याचिकाकर्ता ने वास्तव में डिप्टी कमिश्नर के पद पर कार्य नहीं किया था* इसलिए न्यायसंगत संतुलन बनाते हुए अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह 13 जुलाई 2011 से 31 दिसंबर 2016 तक डिप्टी कमिश्नर और सहायक आयुक्त के वेतन के अंतर की राशि का 50 प्रतिशत एरियर्स चार माह के भीतर अदा करे* निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं होने पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देय होगा* अपने निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय के एक पूर्व फैसले का भी उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी कर्मचारी को नियोक्ता की गलती से कार्य करने से रोका गया हो, तो “नो वर्क, नो पे” का सिद्धांत लागू नहीं होता।
