अपहरण के आरोपी 21 वर्ष बाद भी दोषमुक्त नहीं हो सका

  1. ०० हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के मामले में संदेहा का लाभ दिया किन्तु अपहरण का दोषी ठहराया

बिलासपुर। हाईकोर्ट ने 21 वर्ष पहले अभिभावकों के अनुपस्थिति में 16 वर्ष की किशोरी का अपहरण करने एवं संबंध बनाने के आरोप में विचारण न्यायालय से हुई सजा के खिलाफ पेश अपील में आरोपी को धारा 376 के अपराध में पीड़िता की कथित सहमति के आधार पर संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त किया किन्तु पीड़िता की उम्र 18 वर्ष से कम होने के कारण घर में घुसने, अपहरण, अवैध कब्जा में रखने के आरोप में सुनाई गई सजा की पुष्टि की है। जशपुर जिला निवासी 16 वर्षीय पीड़िता माता-पिता के गांव से बाहर जाने पर 17 मार्च 2005 को घर में अपनी छोटी बहनों के साथ घर पर थी। आरोपी वीरेन्द्र विश्वकर्मा उसके घर आया और उसे रायगढ़ चलने के लिए कहा। जब पीड़िता ने मना कर दिया, तो आरोपी ने उस पर हमला करने की धमकी दी। इसके बाद, वह उसे बहला-फुसलाकर उसकी मर्ज़ी के खिलाफ़ ज़बरदस्ती रायगढ़ ले गया। रायगढ़ में, जिदल कंपनी के पास, आरोपी ने एक डिपो में एक लड़की के घर में पनाह ली। वहां रहने के दौरान, आरोपी ने शादी का झांसा देकर पीड़िता के साथ तीन बार ज़बरदस्ती संबंध बनाया। 20.03.2005 को उसे ढूंढते हुएआरोपी का बड़ा भाई व एक अन्य व्यक्ति वहां पहुंचे। पहले दिन आरोपी ने पीड़िता को छिपा दिया। अगले दिन यानी 21.03.2005 को जब वे फिर वहां पहुंचे, तो वे पीड़िता और आरोपी दोनों को वापस गांव ले आए। 24.03.2005 को पीड़िता ने घटना के संबंध में पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट दर्ज कराई। सुनवाई उपरांत विचारण न्यायालय ने आरोपी को धारा 450, 363, 366, 376 के तहत सजा सुनाई। इसके खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील पेश की थी। हाईकोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया एवं आरोपी को धारा 376 के तहत सुनाई गई सजा को रद्द किया किन्तु धारा 363, 366 एवं 450 के तहत सुनाई गई सजा की पुष्टि की है। आरोपी ने इन धाराओं की सजा पहले ही पूरी कर ली है, इस कारण से उसे जेल जाने की आवश्यकता नहीं है। ०००

कोर्ट ने आदेश में यह कहा रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत अपील करने वाले को आईपीसी की धारा 376 के तहत सज़ा वाले अपराध का दोषी ठहराने के लिए काफ़ी भरोसा नहीं जगाते हैं। इसलिए, अपील करने वाला संदेह का लाभ पाने का हकदार है। इसलिए वह आईपीसी की धारा 376 के तहत अपराध के आरोप से बरी होने का हकदार है। सेक्शन 363, 366, और 450 के तहत अपराधों के संबंध में, पीड़िता की गवाही, जिसकी पुष्टि गवाहों ने की है, यह साफ पता चलता है कि आरोपी पीड़िता के माता-पिता की गैरमौजूदगी में उसके घर में घुसा और उसे ले गया। पीड़िता को उसके कानूनी अभिभावकों से उनकी सहमति के बिना ले जाने का काम सेक्शन 363 आईपीसी के तहत किडनैपिग का अपराध बनता है। इसके अलावा, हालात बताते हैं कि आरोपी ने पीड़िता को नाजायज़ संबंध बनाने के इरादे से अपने साथ जाने के लिए उकसाया, जिससे सेक्शन 366 आईपीसी के तहत अपराध बनता है। इसके अलावा, इस इरादे से घर में घुसने का काम इस मामले को सेक्शन 450 आईपीसी के दायरे में लाता है। अभियोजन ने इन अपराधों को बिना किसी शक के सफलतापूर्वक साबित कर दिया है। रिकॉर्ड से यह साफ़ है कि अपील करने वाला पहले ही 4 साल और 4 महीने की जेल काट चुका है। ट्रायल कोर्ट द्बारा दी गई सभी सज़ाएँ, यानी 3 साल, 4 साल और 4 साल, एक साथ चलने का आदेश दिया गया था। इसलिए, अपील करने वाले ने पहले ही उस पर लगाई गई ज़्यादा से ज़्यादा सज़ा काट ली है। उसे इन अपराधों के लिए कोई और सज़ा काटने की ज़रूरत नहीं है।

kamlesh Sharma

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