अदालतें चिकित्सा क्षेत्र की विशेषज्ञ संस्थाएँ नहीं हैं, ‘दिव्यांगता मूल्यांकन बोर्ड’ द्बारा दी गई राय को उचित सम्मान देना चाहिए-हाईकोर्ट ०० याचिकाकर्ता के खिलाफ प्रारंभ की गई आपराधिक कार्रवाई का आदेश निरस्त

बिलासपुर। हाईकोर्ट ने शिक्षक के खिलाफ फर्जी दिव्यांगता प्रमाणपत्र पेश करने के आरोप में आपराधिक कार्रवाई प्रारंभ किए जाने के खिलाफ पेश याचिका में कहा कि अदालतें चिकित्सा क्षेत्र की विशेषज्ञ संस्थाएँ नहीं हैं, फिर भी उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रिया की न्यायिक समीक्षा करने का अधिकार प्राप्त है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वह प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और स्थापित कानूनी सिद्धांतों के अनुरूप हो; तथापि, जिन मामलों में चिकित्सा विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है, उनमें उन्हें ‘दिव्यांगता मूल्यांकन बोर्ड’ जो कि इस संदर्भ में एक सक्षम प्राधिकारी है—द्बारा दी गई राय को उचित सम्मान देना चाहिए और अंतत: उसी पर निर्भर रहना चाहिए। इसके साथ कोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक प्रकरण चलाने के आदेश को रद्द किया है।

याचिकाकर्ता लखन बिहारी पटेल पुत्र स्वर्गीय अमृत लाल पटेल सहायक अध्यापक (एलबी) के पद में महासमुंद जिला में कार्यरत है। उसे सुनने में दिक्कत थी, इस पर 10 अगस्त 2010 को मेडिकल बोर्ड के सामने पेश हुआ, और सही जांच में पाया गया कि उसे 45.4% कंडक्टिव हियरिग लॉस है, जिसके आधार पर उसके फ़ेवर में डिसेबिलिटी सर्टिफिकेट जारी किया गया । उस सर्टिफिकेट के आधार पर, याचिकाकर्ता ने शिक्षाकर्मी ग्रेड 3 की पोस्ट के लिए अप्लाई किया और सही सिलेक्शन प्रोसेस से गुज़रने के बाद, उसे सही तरीके से चुना गया और वह साल 2010 से उस पोस्ट पर काम कर रहा है। पारिवारिक विवाद पर याचिकाकर्ता के भाई कैलाश चंद्र पटेल ने 12 दिसंबर 2017 को कलेक्टर महासमुंद के समक्ष शिकायत की। शिकायत में कहा गया कि याचिकाकर्ता ने गलत दिव्यांगता प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी हासिल किया है। कलेक्टर महासमुंद ने शिकायत को जांच के लिए एसडीओ राजस्व सरायपाली को निर्देश दिया। जांच के बाद याचिकाकर्ता के खिलाफ 27.01.2018 को रेवेन्यू केस रजिस्टर किया गया, पार्टियों को नोटिस जारी किए गए, जवाब व मेडिकल जांच के आधार पर डॉक्यूमेंट्स के गलत इस्तेमाल का आरोप लगाया और याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की अनुशंसा की गई। इसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में याचिका पेश की। याचिका में जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की कोर्ट में सुनवाई हुई। कोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक प्रकरण चलाने के आदेश को रद्द किया है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा मामले में यह साफ़ है कि जवाब देने वाले अधिकारी ने 2010 में जारी किए गए एक सर्टिफ़िकेट को अमान्य ठहराने के लिए, 2018 में किए गए बाद के मेडिकल टेस्ट पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा किया है। यह तरीका बुनियादी तौर पर गलत है, क्योंकि विकलांगता कोई स्थिर स्थिति नहीं है और समय के साथ इसमें बदलाव आ सकता है। किसी खास समय पर सही तरीके से जारी किए गए सर्टिफ़िकेट को, सिर्फ़ बाद के मेडिकल आकलन के आधार पर पिछली तारीख से अमान्य नहीं ठहराया जा सकता; जब तक कि कोई सक्षम अधिकारी यह पक्के तौर पर साबित न कर दे कि मूल सर्टिफ़िकेशन प्रक्रिया में ही धोखाधड़ी या गलतबयानी हुई थी। इस मामले में, कानूनी तौर पर मान्य सबूतों के आधार पर, ऐसा कोई भी निष्कर्ष दर्ज नहीं किया गया है। इसके अलावा, 2016 के एक्ट, उसके तहत बनाए गए नियमों, और विकलांगता सर्टिफ़िकेट को निष्क्रिय या रद्द करने के लिए तय की गई ‘स्टैंडर्ड ऑपरेटिग प्रोसीजर’ का पालन नहीं किया गया है। इस तय ढांचे के अनुसार, विकलांगता सर्टिफ़िकेट की प्रामाणिकता (असलीयत) के बारे में किसी भी संदेह की जांच, सर्टिफ़िकेट जारी करने वाले अधिकारी या विधिवत गठित ‘मेडिकल बोर्ड’ द्बारा एक व्यवस्थित प्रक्रिया के तहत की जानी चाहिए; जिसमें निष्पक्षता, पारदर्शिता और सुनवाई का अवसर सुनिश्चित किया जाए। इसके साथ याचिकाकर्ता के खिलाफ प्रारंभ की गई कार्रवाई के आदेश को रद्द किया है।

kamlesh Sharma

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