महिला आयोग के निर्देश पर युवती को नारी निकेतन में भेजने के खिलाफ याचिका

००० हाईकोर्ट ने कहा किसी भी प्राधिकारी को कानून की सीमाओं के भीतर ही कार्य करना चाहिए,

बिलासपुर। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा एवं जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डीबी ने छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग के आदेश पर व्यस्क, मानसिक रूप से स्वस्थ युवती को नारी निकेतन में रख्ो जाने के खिलाफ पेश याचिका में कहा है कि वैधानिक शक्तियों का प्रयोग करने वाले किसी भी प्राधिकारी को कानून की सीमाओं के भीतर ही सख्ती से कार्य करना चाहिए, और वह किसी भी वयस्क व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को, कानून द्बारा स्थापित उचित प्रक्रिया के अनुसार ही, सीमित कर सकता है; अन्यथा नहीं। इसके साथ कोर्ट ने याचिका को निराकृत किया है।

धमतरी जिला निवासी महिला ने छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग रायपुर से एक युवती के खिलाफ शिकायत की थी। शिकायत में कहा गया कि युवती का उसके पति के साथ अवैध संबंध है। आयोग ने दोनों पक्षों को बुलाया एवं चर्चा उपरांत 12 मार्च 2026 को युवती को नारी निकेतन रायपुर में रखने का आदेश दिया। आयोग के निर्देश पर युवती को ऑब्जर्वेशन होम रायपुर भ्ोजा गया। इस मामले में युवती की मां ने हाईकोर्ट में बंदीप्रत्यक्षीकरण याचिका पेश की। याचिका में कहा गया कि याचिकाकर्ता रायपुर में रहने वाली एक बुज़ुर्ग महिला है और उसकी बेटी जो बालिग और मानसिक रूप से स्वस्थ महिला है, उसके साथ रहती है। शिकायतकर्ता महिला ने छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग के समक्ष एक शिकायत दर्ज कराई, जिसमें उसने अपने पति और याचिकाकर्ता की बेटी के बीच अवैध संबंध होने का आरोप लगाया। उक्त शिकायत पर कार्रवाई करते हुए, आयोग ने संबंधित व्यक्तियों को तलब किया और उसके बाद12.03.2026 को एक आदेश पारित किया, जिसमें निर्देश दिया गया कि याचिकाकर्ता की बेटी को रायपुर स्थित नारी निकेतन केंद्र के ऑब्ज़र्वेशन होम में रखा जाए। याचिकाकर्ता का आगे यह भी कहना है कि इस तथ्य के बावजूद कि उसकी बेटी के खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया गया है और किसी भी सक्षम न्यायालय ने कोई हिरासत आदेश पारित नहीं किया है, उसे कानून के किसी भी अधिकार के बिना ऑब्ज़र्वेशन होम में रखा गया। छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग अधिनियम, 1995 के नियमों के तहत किसी बालिग महिला को नारी निकेतन में हिरासत में रखने का कोई अधिकार नहीं है। याचिका में युवती को अवैध हिरासत से मुक्त कराने एवं क्षतिपूर्ति दिलाए जाने की मांग की गई थी। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा एवं जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डीबी में मामले की सुनवाई हुई। डीबी ने महिला आयोग सहित अन्य को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया। आयोग की ओर से कहा गया कि युवती को अथॉरिटी ने सुरक्षा पक्का करने और उठाई गई शिकायत को दूर करने के लिए कार्रवाई की। यह कहा गया है कि कार्रवाई अच्छी नीयत से और सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए की गई थी। उन्होंने आगे कहा कि कार्रवाई के दौरान, पार्टियों के बीच स्थिति का आकलन किया गया और उसी के अनुसार ज़रूरी कदम उठाए गए। राज्य के वकील ने बताया है कि पिटीशनर की बेटी को 30.03.2026 को नारी निकेतन केंद्र से पहले ही रिहा कर दिया गया है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं को सुना और रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री का अवलोकन किया। रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री का अवलोकन करने के बाद, ऐसा प्रतीत होता है कि याचिकाकर्ता की शिकायत उसकी बेटी को नारी निकेतन केंद्र में कथित रूप से अवैध रूप से हिरासत में रखे जाने से संबंधित है। याचिकाकर्ता की बेटी को नारी निकेतन केंद्र से पहले ही रिहा किया जा चुका है। उपरोक्त घटनाक्रम को देखते हुए, याचिकाकर्ता द्बारा अपनी बेटी की रिहाई के लिए मांगी गई मुख्य राहत अब विचारणीय नहीं रह गई है। तथापि, यह न्यायालय यह टिप्पणी करता है कि वैधानिक शक्तियों का प्रयोग करने वाले किसी भी प्राधिकारी को कानून की सीमाओं के भीतर ही सख्ती से कार्य करना चाहिए, और वह किसी भी वयस्क व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को, कानून द्बारा स्थापित उचित प्रक्रिया के अनुसार ही, सीमित कर सकता है; अन्यथा नहीं। कोर्ट ने इसके साथ याचिका को निराकृत किया है।

kamlesh Sharma

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