न्याय का प्रशासन सत्यनिष्ठा, दक्षता और करुणा के साथ करें : जस्टिस सिन्हा

  • विधिक अधिकारियों का  विशेष प्रशिक्षण

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ राज्य न्यायिक अकादमी, बिलासपुर द्वारा रविवार को अकादमी के विवेकानंद सभागार में एफटीसी एवं एफटीएससी न्यायालयों के न्यायाधीशों, लोक अभियोजकों, जिला अभियोजन अधिकारियों, मानव तस्करी निरोधक प्रकोष्ठ के अधिकारियों एवं विवेचना अधिकारियों हेतु एक विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम मानव तस्करी निरोध, लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 तथा ई-साक्ष्य, ई-समन एवं न्याय श्रुति विषयों पर न्यायिक संवाद के रूप में आयोजित किया गया।

मुख्य अतिथि, न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा, मुख्य न्यायाधीश, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय एवं छत्तीसगढ़ राज्य न्यायिक अकादमी के मुख्य संरक्षक, द्वारा दीप प्रज्वलन कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया।

कार्यक्रम में न्यायमूर्ति पार्थ प्रतीम साहू न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी,  न्यायमूर्ति सचिन सिंह राजपूत,  न्यायमूर्ति राकेश मोहन पाण्डेय,  न्यायमूर्ति राधाकिशन अग्रवाल,  न्यायमूर्ति संजय कुमार जायसवाल,  न्यायमूर्ति रविन्द्र कुमार अग्रवाल,  न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा,  न्यायमूर्ति बिभू दत्ता गुरु एवं  न्यायमूर्ति अमितेन्द्र किशोर प्रसाद, न्यायाधीशगण, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की गरिमामयी उपस्थिति रही मुख्य न्यायाधीश  ने अपने उद्बोधन में ज्ञान, संवेदनशीलता एवं समन्वित संस्थागत प्रयासों के माध्यम से आपराधिक न्याय प्रणाली को सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि ये कार्यक्रम न्यायपालिका की साझा प्रतिबद्धता का प्रतीक हैं, जिसके माध्यम से दक्षता, करुणा एवं संवैधानिक निष्ठा के साथ न्याय प्रदान किया जाता है।

पॉक्सो अधिनियम के महत्व पर प्रकाश डालते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह विधि बच्चों के विरुद्ध लैंगिक अपराधों के निवारण हेतु बाल-मित्र, सशक्त एवं समयबद्ध तंत्र प्रदान करने के उद्देश्य से अधिनियमित की गई है, इसकी सफलता मानवीय एवं उद्देश्यपरक व्याख्या पर निर्भर करती है। न्यायिक अधिकारियों से अपेक्षा की गई कि वे कठोरता एवं सहानुभूति के मध्य संतुलन स्थापित करें तथा न्यायालयों में सुरक्षित एवं सम्मानजनक वातावरण बनाएं, जहाँ पीड़ित स्वयं को संरक्षित अनुभव करें। साक्ष्य लेखन में संवेदनशीलता, आघात की समझ तथा प्रक्रिया संबंधी सुरक्षा उपायों का कठोर अनुपालन आवश्यक बताया गया।

मुख्य न्यायाधीश ने यह भी रेखांकित किया कि अन्वेषण किसी भी आपराधिक विचारण की आधारशिला है। त्रुटिपूर्ण अन्वेषण से न्याय का हनन हो सकता है, चाहे वह दोषमुक्ति के रूप में हो या निरपराध व्यक्ति के अभियोजन के रूप में। साक्ष्य के सूक्ष्म संकलन, श्रृंखला संरक्षण, वैज्ञानिक परीक्षण एवं निष्पक्ष अभिलेखन के: सूक्ष्म सकलन, श्रृंखला संरक्षण, महत्व पर बल देते हुए विवेचना अधिकारियों को सत्य की खोज को अपनी सर्वोपरि जिम्मेदारी मानने का आह्वान किया गया।

अभियोजकों की महत्वपूर्ण भूमिका पर बल देते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि एक अभियोजक का प्रथम कर्तव्य है कि वह प्रकरण को निष्पक्ष रूप से प्रस्तुत करे, न्यायालय को सत्य तक पहुँचने में सहयोग प्रदान करे तथा पीड़ित और अभियुक्त दोनों के अधिकारों का समुचित संरक्षण सुनिश्चित करे। उन्होंने यह भी कहा कि साक्ष्यों का दमन, अतिउत्साही तर्क-वितर्क अथवा अपर्याप्त तैयारी न केवल अभियोजन को कमजोर करती है, बल्कि न्याय वितरण प्रणाली में जनविश्वास को भी क्षीण करती है।

डिजिटल मंचों- ई-साक्ष्य, ई-समन एवं न्याय श्रुति की महत्ता का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ये साधन न्याय वितरण प्रणाली में पारदर्शिता, दक्षता एवं उत्तरदायित्व को सुदृढ़ करते हैं। तकनीकी प्रगति के साथ-साथ पर्याप्त प्रशिक्षण, अनुकूलन क्षमता एवं प्रगतिशील दृष्टिकोण भी आवश्यक है।

संबोधन के समापन में मुख्य न्यायाधीश ने पुनः उल्लेख किया कि प्रत्येक वाद-प्रकरण एक मानवीय कथा है और न्याय प्रणाली से जुड़े सभी हितधारकों का यह सामूहिक दायित्व है कि न्याय सत्यनिष्ठा, दक्षता एवं करुणा के साथ प्रदान किया जाए।

kamlesh Sharma

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