15 साल बाद भी मकान बेचने का अनुबंध बरकरार, हाईकोर्ट ने महिला की अपील खारिज की ०० खरीदार को मकान की रजिस्ट्री कराने का आदेश, विक्रेता को एक लाख रुपये अतिरिक्त देने होंगे
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मकान बेचने के अनुबंध के पालन से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए विक्रेता राजवंश कौर की अपील खारिज कर दी है। जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की एकलपीठ ने कहा कि केवल लंबा समय बीत जाने के आधार पर अनुबंध के विशिष्ट पालन की राहत से खरीदार को वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने दुर्ग के छठवें अतिरिक्त जिला न्यायाधीश द्वारा पारित फैसले को बरकरार रखते हुए खरीदार लता बत्रा के पक्ष में मकान की रजिस्ट्री कराने का आदेश कायम रखा है। हालांकि, संपत्ति की बाजार कीमत में संभावित वृद्धि को देखते हुए खरीदार को अनुबंध में तय कीमत के अतिरिक्त एक लाख रुपये देने का निर्देश भी दिया है।
मामले के अनुसार, राजवंश कौर और लता बत्रा के बीच 29 मई 2006 को वैशाली नगर, सुपेला, भिलाई स्थित मकान के संबंध में साढ़े चार लाख रुपये में बेचने का अनुबंध हुआ था। इसमें से एक लाख रुपये अग्रिम के रूप में दिए गए थे तथा शेष साढ़े तीन लाख रुपये देकर चार महीने के भीतर बिक्री विलेख का पंजीयन कराया जाना था। लता बत्रा ने निर्धारित समय में शेष राशि की व्यवस्था कर मकान के हस्तांतरण के लिए छत्तीसगढ़ गृह निर्माण मंडल से अनापत्ति प्रमाणपत्र मांगा। उन्होंने राजवंश कौर को नोटिस भेजकर बिक्री विलेख निष्पादित करने के लिए भी कहा, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। इसके बाद लता ने अनुबंध का पालन कराने के लिए अदालत में वाद दायर किया।
राजवंश कौर ने अनुबंध से इनकार करते हुए मकान पर अपने मालिकाना हक को लेकर भी सवाल उठाया था। उनका कहना था कि संपत्ति का स्वामित्व गृह निर्माण मंडल के पास है और वह इसे बेचने में सक्षम नहीं हैं। उन्होंने अनुबंध को निरस्त बताते हुए वाद खारिज करने की मांग की। वहीं, गृह निर्माण मंडल ने भी अपने खिलाफ मुकदमा चलाने से पहले निर्धारित नोटिस देने की कानूनी शर्त का पालन नहीं किए जाने की दलील दी थी। विचारण न्यायालय ने दस्तावेजों और साक्ष्यों के आधार पर अनुबंध को सही पाया। हस्ताक्षर विशेषज्ञ की रिपोर्ट से भी राजवंश कौर के अनुबंध पर किए गए हस्ताक्षर प्रमाणित हुए। इसके बाद न्यायालय ने लता बत्रा के पक्ष में अनुबंध के विशिष्ट पालन की डिक्री पारित की थी।
हाईकोर्ट ने अपील पर सुनवाई के दौरान पाया कि लता बत्रा लगातार अनुबंध पूरा करने के लिए तैयार और इच्छुक थीं, जबकि राजवंश कौर ने नोटिसों का जवाब नहीं दिया और अनुबंध पर अपने हस्ताक्षर से भी इनकार किया, जो विशेषज्ञ साक्ष्य से गलत साबित हुआ। अदालत ने कहा कि विक्रेता का आचरण भरोसेमंद नहीं रहा और 15 साल से अधिक समय तक मुकदमा चलने मात्र से खरीदार को न्यायसंगत राहत देने से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि, संपत्ति की बाजार कीमत में संभावित बढ़ोतरी को ध्यान में रखते हुए मूल साढ़े चार लाख रुपये के अतिरिक्त एक लाख रुपये देने का निर्देश दिया गया। अपीलकर्ता राजवंश कौर को अपील का खर्च भी वहन करना होगा।

kamlesh Sharma

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