पत्नी का वैवाहिक जिम्मेदारियों से विमुख रहना क्रूरता की श्रेणी में आता है-हाई कोर्ट
० पति के पक्ष में तलाक का आदेश बरकरार
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने वैवाहिक क्रूरता के मामले में पत्नी की अपील खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट द्वारा पति के पक्ष में दिए गए तलाक के आदेश को बरकरार रखा है। जस्टिस पार्थ प्रतिम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की डिवीजन बेंच ने कहा कि पत्नी का व्यवहार पति के प्रति क्रूरता की श्रेणी में आता है। ऐसे में फैमिली कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है।
मामले के अनुसार, दुर्ग निवासी अपीलकर्ता की डोंगरगढ़ निवासी युवक से विवाह 1 जनवरी 2015 को हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था। उनका एक बेटा है, जो वर्तमान में मां के साथ रह रहा है। पति का आरोप था कि पत्नी शादी के बाद पढ़ाई के लिए दुर्ग में अपने माता-पिता के साथ रहना चाहती थी। उसने फिजियोथेरेपी की पढ़ाई छोड़कर अन्य पाठ्यक्रम किए और बाद में दुर्ग जिला अस्पताल में डाटा एंट्री ऑपरेटर की नौकरी भी कर ली। पति के अनुसार, उसने पत्नी को डोंगरगढ़ में रहकर नौकरी करने और वैवाहिक जीवन जारी रखने के लिए कई बार समझाया, लेकिन वह तैयार नहीं हुई। दोनों के बीच विवाद बढ़ने पर पत्नी मायके चली गई और महिला थाने में शिकायत भी दर्ज कराई। समझौते के प्रयास विफल होने के बाद पति ने वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए आवेदन किया, लेकिन बाद में तलाक की मांग की।
पत्नी ने पति के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि उसे प्रताड़ित कर घर से निकाल दिया गया था और पति ने उसे वापस लाने का प्रयास नहीं किया। उसका कहना था कि हाईकोर्ट के निर्देश पर दोनों को अपने-अपने मामले वापस लेकर वैवाहिक जीवन सुधारने का अवसर दिया गया था। इसके बाद वह पति के घर भी गई, लेकिन उसे फिर प्रताड़ित कर निकाल दिया गया। पत्नी ने यह भी कहा कि वह बच्चे के भविष्य और परिवार की भलाई के लिए पति के साथ रहने को तैयार है। फैमिली कोर्ट ने पत्नी के खिलाफ क्रूरता का आरोप प्रमाणित मानते हुए 3 अगस्त 2024 को तलाक की डिक्री पारित की थी। हालांकि, परित्याग का आरोप प्रमाणित नहीं माना था।
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि क्रूरता शारीरिक के साथ मानसिक भी हो सकती है और इसका निर्धारण प्रत्येक मामले के तथ्यों एवं परिस्थितियों के आधार पर किया जाता है। सुप्रीम कोर्ट के समर घोष विरुद्ध जया घोष मामले में प्रतिपादित सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए बेंच ने कहा कि पति-पत्नी के व्यवहार के समग्र प्रभाव को देखकर मानसिक क्रूरता का आकलन किया जाना चाहिए। इस मामले में पत्नी का वैवाहिक जिम्मेदारियों से विमुख रहना और पति के साथ रहने के प्रयासों को लगातार अस्वीकार करना क्रूरता की श्रेणी में आता है। वहीं, पत्नी के किसी अन्य व्यक्ति से संबंध होने के आरोप पर कोर्ट ने उसके चरित्र पर टिप्पणी करने से परहेज किया। बेंच ने फैमिली कोर्ट के फैसले में कोई त्रुटि नहीं पाते हुए पत्नी की अपील खारिज कर दी और तलाक की डिक्री को बरकरार रखा। खर्च के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया गया।
