दुष्कर्म पीड़िता को गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर करना उसके गरिमा के अधिकार का उल्लंघन होगा-हाई कोर्ट
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने नाबालिग अवस्था में दुष्कर्म की शिकार हुई एक महिला को गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी है। कोर्ट ने कहा कि, इस मामले के असाधारण तथ्यों में गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर करना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले गरिमा, निजता, शारीरिक स्वतंत्रता और प्रजनन संबंधी निर्णय के अधिकार का लगातार उल्लंघन होगा। कोर्ट ने कहा कि. सोनोग्राफी में बताई गई गर्भावस्था की अवधि अनुमानित होती है और इसमें करीब दो सप्ताह तक का अंतर संभव है। इसलिए केवल गर्भावस्था की अनुमानित अवधि के आधार पर पीड़िता को राहत से वंचित नहीं किया जा सकता। मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में भी पीड़िता को गर्भावस्था के मेडिकल टर्मिनेशन के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से फिट पाया गया। हाईकोर्ट ने संबंधित चीफ मेडिकल एंड हेल्थ ऑफिसर, बिलासपुर को निर्देश दिया है कि, पीड़िता को 10 अगस्त 2026 को संबंधित सरकारी अस्पताल में भर्ती कराकर विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम से मेडिकल टर्मिनेशन कराया जाए। प्रक्रिया मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट और निर्धारित चिकित्सा प्रोटोकॉल के अनुसार होगी। पीड़िता की लिखित सहमति लेने तथा आवश्यक होने पर उसकी मां/कानूनी अभिभावक की मौजूदगी और सहमति सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए गए हैं। कोर्ट ने पीड़िता की पहचान और मेडिकल जानकारी पूरी तरह गोपनीय रखने, उसे उपचार के साथ काउंसलिंग व मनोवैज्ञानिक सहायता देने तथा आवश्यक परिवहन उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं* चूंकि मामले में पाक्सो सहित अन्य धाराओं के तहत सिविल लाइंस थाने में अपराध क्रमांक 1012/2026 की जांच चल रही है, इसलिए भ्रूण के ऊतक, प्लेसेंटा, रक्त, डीएनए सहित अन्य जैविक साक्ष्यों को फोरेंसिक प्रोटोकॉल के अनुसार सुरक्षित रखने का भी आदेश दिया गया है* मेडिकल टर्मिनेशन और पोस्ट-ऑपरेटिव उपचार पूरा होने के दो सप्ताह के भीतर सीएम्एचओ को हाईकोर्ट में अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।
