डॉ. भीमराव अंबेडकर मेमोरियल अस्पताल में सीटी स्कैन मशीन व गामा कैमरा खरीदी में अनियमिता ०० दोषियों पर एफआईआर की अनुशंसा के खिलाफ पेश याचिका खारिज ०० तत्कालीन संयुक्त निदेशक सह अस्पताल अधीक्षक डॉ. चौधरी ने पेश की थी याचिका
बिलासपुर। हाईकोर्ट ने डॉ. भीमराव अंबेडकर मेमोरियल अस्पताल रायपुर में सीटी स्कैन और गामा कैमरा की खरीद और स्थापना से संबंधित कथित भ्रष्टाचार और सरकारी/सार्वजनिक कोष के दुरुपयोग के मामले में, दोषी कर्मियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने की अनुशंसा के खिलाफ तत्कालीन संयुक्त निदेशक-सह-अधीक्षक की याचिका को यह कहते हुए खारिज किया कि किसी संभावित आरोपी के पास आपराधिक कार्यवाही शुरू होने से पहले अपनी बात रखे जाने का कोई निहित अधिकार नहीं होता, क्योंकि बीएनएस में एफआईआर दर्ज होने से पहले संभावित आरोपी को सुनवाई का अधिकार प्रदान नहीं किया गया है। याचिकाकर्ता डॉ. विवेक चौधरी डॉ भीमराव अंबेडकर मेमोरियल अस्पताल में संयुक्त निदेशक सह अस्पताल अधीक्षक के पद में कार्यरत थ्ो। मुंबई की मेडिकल सर्विसेज कंपनी ने छत्तीसगढ़ सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के मंत्री को, एक अत्याधुनिक न्यूक्लियर मेडिसिन डायग्नोस्टिक सेंटर स्थापित करने का एक ‘टर्नकी’ प्रस्ताव दिया। मंत्री ने 10-03-2018 को इस प्रस्ताव को याचिकाकर्ता के पास उनकी राय जानने के लिए भेजा। इसके बाद, 16-03-2018 को याचिकाकर्ता ने खरीद के तरीके के संबंध में अपनी राय दी, और यह भी सुझाव दिया कि इसे सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल के तहत किया जाना चाहिए। इसके बाद शासन ने सीटी स्कैन और गामा कैमरा मशीन की खरीद और स्थापना में हुई अनियमितताओं के संबंध में रेडियोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष से कुछ जानकारी मांगी। इस मामले में अनियमितता होने की बात सामने आने पर जांच कमेटी का गठन किया गया। जांच रिपोर्ट पर सचिव चिकित्सा शिक्षा विभाग ने अगस्त 2021 को दोषी कर्मचारियों के खिलाफ एफआईआर करने की अनुशंसा की है। इसके खिलाफ तत्कालीन संयुक्त निदेशक सह अस्पताल अधीक्षक डॉ. चौधरी ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल चुनौती दी थी। याचिका में जस्टिस बिभु दत्त गुरू की कोर्ट में सुनवाई हुई। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि मामले में निर्धारित कानून के दृष्टिकोण से, किसी संभावित आरोपी के पास आपराधिक कार्यवाही शुरू होने से पहले अपनी बात रखने का कोई निहित अधिकार नहीं है, क्योंकि एफआईआर दर्ज होने से पहले संभावित आरोपी को सुनवाई का अधिकार प्रदान नहीं करता है। इस कोर्ट की सुविचारित राय में, वर्तमान मामला ऐसी किसी भी असाधारण श्रेणी में नहीं आता है। जांच रिपोर्ट, जो विवादित संचार का आधार है, खरीद प्रक्रिया में प्रथम दृष्टया अनियमितताओं को उजागर करती है, जिसमें भारी मात्रा में सार्वजनिक धन शामिल है; इस प्रकार, यह आगे की जांच को उचित ठहराती है। याचिकाकर्ता अंतत: कथित अनियमितताओं के लिए जिम्मेदार पाया जाता है या नहीं, यह एक ऐसा मामला है जिसका निर्धारण केवल गहन जांच के बाद और, यदि आवश्यक हो, तो मुकदमे के दौरान ही किया जा सकता है। इस चरण पर, इस कोर्ट द्बारा किया गया कोई भी हस्तक्षेप जांच को समय से पहले ही रोक देने के समान होगा। इसके साथ कोर्ट ने याचिका को खारिज किया है।
