बंगलादेशी महिला एवं उसका नाबालिग पुत्र डिपोर्ट होने तक नारी निकेतन में रहेंगे-हाई कोर्ट
०० पुलवामा हमला के बाद जांच में पकड़े गए थे कथित पति-पत्नी
बिलासपुर। हाईकोर्ट ने बंगलादेशी युवती को भगाकर भारत लाने एवं यहां शादी करने के मामले में पकड़े जाने के बाद युवती एवं उसके नाबालिग पुत्र को नारी निकेतन में सुरक्षित रख्ो जाने पर पति द्बारा हेबियस कार्पस रिट पेश कर पत्नी व बच्चे को नारी निकेतन से मुक्त करने पेश याचिका को खारिज किया है। कोर्ट ने कहा कि महिला का भारत में कोई गार्जियन नहीं होने एवं अवैध रूप से रहने के कारण उनकी भलाई के लिए नारी निकेतन में रखा गया है। पुलवामा घटना के बाद में पति पत्नी को बिलासपुर पुलिस ने हिरासत में लिया है।
याचिकाकर्ता ने अपने आप को देवरीखुर्द बिलासपुर का नागरिक बताते हुए अपनी पत्नी एवं नाबालिग पुत्र को रायपुर के नारी निकेतन में जबरन हिरासत में रख्ो जाने की बात कहते हुए उन्हें मुक्त कराने हाईकोर्ट में बंदीप्रत्यक्षीकरण याचिका पेश की थी। याचिका में कहा गया था कि वह ब्राम्हण है, उसकी पत्नी मुस्लिम है। दोनों की जाति अलग होने पर लड़की के घर वाले विरोध में थे। इस पर वह उसके साथ भाग कर आई एवं काली मंदिर में शादी करने के बाद पति-पत्नी के तौर पर साथ रह रहे थ्ो। 2०25 में एक शिकायत के बाद उसके खिलाफ पाक्सो एक्ट के तहत अपराध दर्ज कर जेल दाखिल किया गया था। जेल में निरूद्ब रहने के दौरान उसकी पत्नी गर्भवती थी, उसे पहले बाल कल्याण समिति में रखा गया। बाद में नारी निकेतन रायपुर में रखा गया है। नारी निकेतन में उसने पुत्र का जन्म दिया है। इस आधार पर उसने दोनों को नारी निकेतन से मुक्त करा कर उसके सुर्पुद करने की मांग की थी।
मामले में शासन की ओर से कोर्ट को बताया गया कि याचिकाकर्ता एवं उसकी कथित पत्नी बंगलादेशी नागरिक हैं। दोनों भाग कर भारत आए एवं यहां कथित रूप से शादी की है। महिला एवं उसके बच्चे की सुरक्षा के लिए दोनोें को नारी निकेतन में रखा गया है। याचिकाकर्ता के खिलाफ बंगलादेश में अपहरण का अपराध दर्ज है। शासन व याचिकाकर्ता के पक्षा को सुनने के बाद चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा एवं जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डीबी ने अपने आदेश में कहा कि
हेबियस कॉर्पस की रिट तभी चल सकती है जब कोई व्यक्ति गैर-कानूनी हिरासत में हो। जहां किसी व्यक्ति की कस्टडी कानूनी है और कानूनी अथॉरिटी के अनुसार या ऐसे व्यक्ति की भलाई और सुरक्षा के लिए है, आर्टिकल 226 के तहत एक्स्ट्राऑर्डिनरी जूरिस्डिक्शन का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इस मामले में,बंदी जो कथित तौर पर पिटीशनर की पत्नी है, वह एक विदेशी नागरिक है जो बिना वैलिड ट्रैवल डॉक्यूमेंट्स के भारत में आई थी। इसलिए भारत में उसकी मौजूदगी अनऑथराइज्ड है। राज्य, विदेशी नागरिकों की एंट्री और रहने को रेगुलेट करने की सॉवरेन जिम्मेदारी के तहत, कानून के अनुसार डिपोर्टेशन पेंडिग रहने तक उसकी हिरासत के लिए कदम उठाने के लिए सक्षम है। रिकॉर्ड आगे दिखाता है कि ‘बंदी महिला’ और ‘उसका पुत्र’ नारी निकेतन में हैं।
कानून के हिसाब से डिपोर्टेशन। रिकॉर्ड से यह भी पता चलता है कि महिला और ‘उसके पुत्र’ को नारी निकेतन में रखा गया है। यह सज़ा के तौर पर नहीं बल्कि उनकी सुरक्षा, देखभाल और भलाई के लिए है। जिस लड़की को हिरासत में लिया गया है, वह एक जवान औरत है जिसका भारत में कोई गार्जियन नहीं था, वह उस समय प्रेग्नेंट थी, और बाद में उसने एक लड़के को जन्म दिया। ऐसे हालात में, किसी वेलफ़ेयर इंस्टीट्यूशन में प्रोटेक्टिव कस्टडी को गैर-कानूनी हिरासत नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि डिपोर्टेशन की कार्रवाई भारत सरकार के संबंधित मंत्रालयों के साथ मिलकर अधिकारियों ने पहले ही शुरू कर दी है। इस तरह, महिला और उसके नाबालिग बेटे का प्रोटेक्टिव होम में लगातार रहना कानूनी डिपोर्टेशन की फॉर्मैलिटी पूरी होने तक सिर्फ एक टेम्पररी व्यवस्था है। इसके अलावा, भारत में क्रिमिनल केस में पिटीशनर के बरी होने से उसे अपनी पत्नी की कस्टडी मांगने या उसके प्रोटेक्टिव स्टे पर सवाल उठाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं मिलता, खासकर तब जब उसकी नेशनैलिटी और इमिग्रेशन स्टेटस बिना किसी शक के इर्रेगुलर हो और राज्य कानूनी तौर पर उसे वापस लाने की दिशा में आगे बढ़ रहा हो।
चूंकि कथित डिटेन्यू की कस्टडी न तो अनऑथराइज़्ड है और न ही गैर-कानूनी, बल्कि उसकी भलाई के लिए है और कानूनी डिपोर्टेशन पेंडिग है, इसलिए भारत के संविधान के आर्टिकल 226 के तहत हेबियस कॉर्पस रिट जारी करने का कोई आधार नहीं बनता है। रिट पिटीशन खारिज की जाती है।
