निर्दोष गरीब रिक्शा चालक को तीन वर्ष के संघर्ष के बाद हाई कोर्ट से इन्साफ मिला
00 झूठी एफआईआर रद्द किया गया
बिलासपुर। गरीब रिक्शा चालक को बिना किसी अपराध के आरोपी बनाकर उससे 17 हजार वसूल लिए गये। पौने तीन साल के संघर्ष के बाद आखिरकार उसे हाईकोर्ट से इन्साफ मिल सका जब कोर्ट ने झूठी एफआईआर को रद्द करने का आदेश दिया।
सक्ती में करीब तीन साल पहले एक रिक्शा चालक कुछ पुलिस वालों की कारस्तानी का शिकार हुआ था, उसे दोषी नहीं होने पर भी थाने जाना पड़ा और घर की मरम्मत कराने जमा किये गये पैसे भी लूट लिए गए। इस मामले में हाईकोर्ट में पहले क्रिमिनल रिट पिटीशन पेश की गई थी। इस पर हाईकोर्ट ने जाँच का आदेश दिया था जाँच के बाद दोषी पुलिस कर्मी को लाइन अटैच कर दिया गया। इसके बाद मिस्लेनियस क्रिमिनल पिटीशन पेश कर एफआईआर निरस्त करने की मांग की गई। डीजीपी ने इस मामले में 4 थानेदारों के खिलाफ निंदा की सजा दी, एक एस आई को सस्पेंड किया गया।
वर्तमान पिटीशन में चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस बीडी गुरु की डीबी में गत 22 अगस्त को सुनवाई हुई, सुनवाई में याचिकाकर्ता के वकील ने बताया कि याचिकाकर्ता जयप्रकाश रात्रे एक अनपढ़ व्यक्ति व रिक्शा चालक है। वह रोजाना शराब पीता था क्योंकि रिक्शा चलाने के कारण वह थक जाता था और घटना की तारीख यानी 2.नवंबर 2022 को भी वह अपने घर पर 150 मिलीग्राम की शराब पी रहा था, उसी समय एक पुलिस कांस्टेबल किशोर साहू (685) और सिविल ड्रेस में तीन अन्य कांस्टेबल उसके घर में आ गए और याचिकाकर्ता को शराब के साथ पुलिस स्टेशन, सक्ती ले आए और कांस्टेबल किशोर साहू (685) ने गरीब याचिकाकर्ता से 17,हजार रुपये की जबरन वसूली की, जो याचिकाकर्ता की पत्नी ने अपनी झोपड़ी की छत ढलाई के लिए कर्ज के रूप में लिए थे।याचिकाकर्ता को पुलिस स्टेशन में तब तक रखा जब तक कि उक्त कांस्टेबल को राशि का भुगतान नहीं किया गया याचिकाकर्ता के खिलाफ आबकारी अधिनियम की धारा 34(1)(ए) के तहत झूठा मामला दर्ज कर दिया गया। यह भी बताया कि , लगभग 2 वर्ष और 9 महीने बीत जाने के बाद भी वर्तमान मामले में आरोप-पत्र प्रस्तुत नहीं किया गया है। याचिकाकर्ता ने इस न्यायालय के समक्ष एक याचिका (सीआर) भी दायर की है, जिसमें प्रतिवादी अधिकारियों को कांस्टेबल किशोर साहू (685) के खिलाफ आपराधिक और विभागीय कार्रवाई करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है। दूसरी ओर, सरकारी वकील ने उपरोक्त दलील का विरोध कर कहा कि न्यायालय के आदेश दिनांक 13.08.2025 के अनुपालन में, पुलिस महानिदेशक ने एक हलफनामा दायर किया है। इसमें कहा गया है कि याचिकाकर्ता के खिलाफ आबकारी की धारा 34(1)(ए) के तहत एफआईआर दर्ज की गई है और उसे बांड भरने के बाद पुलिस ने रिहा कर दिया था।
याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई मामला नहीं बनता हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपित प्राथमिकी 2.11.2022 को दर्ज की गई थी, लेकिन 2 वर्ष और 9 महीने से अधिक समय बीतने के बाद भी आज तक याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई आरोप-पत्र दायर नहीं किया गया है। इस तथ्य पर विचार करते हुए कि याचिकाकर्ता एक गरीब व्यक्ति है, और प्राथमिकी के अवलोकन से, प्रथम दृष्टया, याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई मामला नहीं बनता है। इसलिए याचिकाकर्ता के खिलाफ पुलिस स्टेशन सक्ती, में आबकारी अधिनियम की धारा 34 (1) (ए) के तहत पंजीकृत अपराध संख्या 398/2022 की एफआईआर रद्द की जाती है।