शहीद की मां को पेंशन नहीं देना बहुत गलत बात है-हाईकोर्ट
०० शासन को 6 सप्ताह के अंदर याचिकाकर्ता के मामले में फैसला लेने का निर्देश
बिलासपुर। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा एवं जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डीबी में नियम में संशोधन के बाद पुलिस विभाग अविवाहित मृत कर्मचारी की मां को पेंशन नहीं दिए जाने को लेकर उत्पन्न विवाद में महत्वपूर्ण निणर्य पारित किया है। डीबी ने मामले में कहा कि जहां कोई बाद का कानून या नियमों का सेट किसी पहले के कानून के हिसाब से या उसके आधार पर बनाया गया हो, और बाद के कानून में कुछ फायदेमंद या सहायक नियम न हों, तो कोर्ट को बाद के कानून को ज़रूरी नहीं कि अल्ट्रा वायर्स घोषित कर दे। इसके बजाय, रेफरेंस और तालमेल से बनाने के सिद्धांतों को लागू करते हुए, कोर्ट पहले के कानून के फायदेमंद नियमों को बाद वाले कानून में पढ़ सकता है, ताकि कानूनी इरादे को पूरा असर दिया जा सके और अन्याय या मनमानी से बचा जा सके। नक्सली हमला में शहीद हुए जवान की मां को पेंशन नहीं दिया जाना बहुत गलत बात है। इसके साथ कोर्ट ने शासन को 6 स’ाह के अंदर शहीद की मां के मामले में फैसला करने का निर्देश दिया है।
याचिकाकर्ता .फिलिसिता लकड़ा पत्नी/ओ स्वर्गीय श्री लोबिन लकड़ा उम्र लगभग 68 वर्ष निवासी हाउस नं.28, वार्ड नं.02, कोयला कछार, गोरिया, तहसील कुनकुरी, जशपुर, जिला: जशपुर, छत्तीसगढ़ का पुत्र इग्नेशियस लाकड़ा सूरजपुर छत्तीसगढ़ आर्म्ड फोर्स की 10 बटालियन में एक पुलिस कांस्टेबल (कॉन्स्टेबल नंबर 45०) थे। 11.12.2002 को याचिकाकर्ता का बेटा मुठभेड़ में शहीद हो गया। 21 साल की छोटी उम्र में शहीद हुए बेटे अपने पिता लोबिन लकड़ा, अपनी मां यानी, एक बड़े भाई और दो बहनों को पीछे छोड़ गए। शहीद इग्नाटियस लकड़ा के पिता लोबिन लकड़ा अपने बेटे की मौत के बाद फैमिली पेंशन ले रहे थे। लेकिन लोबिन लकड़ा की भी 23-08-2020 को मौत हो गई। उनके मौत के बाद शहीद की वृद्ब मां ने पेंशन के लिए आवेदन किया। पुलिस फोर्स ने यह कहते हुए उनके आवेदन को निरस्त किया कि नियम 1963 एवं 1965 के रूल्स में 1970 में संशोधन कर काज 6 जोड़ा गया जिसमें यह कहा गया कि पुलिस विभाग के मृत अविवाहित कर्मचारी के मां को पेंशन नहीं दिया जा सकता। इसके खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका पेश की।
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अमेंडमेंट के ज़रिए डाला गया ‘नोट 6’ भी 1965 के रूल्स का हिस्सा माना जाएगा
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा एवं जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डीबी ने सुनवाई उपरांत अपने आदेश में कहा कि हमें यह मानने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि 1965 के एक्ट में भी वैसा ही प्रोविज़न होना चाहिए जैसा 1963 के रूल्स में दिया गया था, जिसे साल 1970 में अमेंडमेंट करके लाया गया था ताकि मृतक एम्प्लॉई की माँ को उसके पिता की मौत के बाद पेंशन का फ़ायदा दिया जा सके,
जिन्हें पेंशन मंज़ूर हो चुकी थी। मृतक एम्प्लॉई की माँ को पेंशन न देना बहुत गलत है, खासकर तब जब इस मामले में, पिटीशनर के बेटे ने एक नक्सली हमले में अपनी जान दे दी। हम इस पिटीशन का निपटारा इस ऑब्ज़र्वेशन के साथ करते हैं कि 30.11.1970 के नोटिफिकेशन के ज़रिए 1963 के रूल्स में अमेंडमेंट के ज़रिए डाला गया ‘नोट 6’ भी 1965 के रूल्स का हिस्सा माना जाएगा और 1965 के रूल्स के तहत पिता को मंज़ूर पेंशन, उनकी मौत के बाद, माँ को मिलेगी। इस तरह, पिटीशनर पेंशन पाने का हकदार होगा और शासन को निर्देश दिया जाता है कि वे आज से छह हफ़्ते के अंदर इस पिटीशन में की गई ऑब्ज़र्वेशन के आधार पर पिटीशनर के केस पर विचार करें और फ़ैसला करें।
