नाबालिग से छेड़छाड़ के मामले में हाईकोर्ट ने बरी करने का फैसला पलटा, आरोपी को दोषी ठहराया
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने नाबालिग से छेड़छाड़ के करीब नौ साल पुराने मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी साधन कुंडू को भारतीय दंड संहिता की धारा 354 ए (1) (आई) के तहत दोषी ठहराया है। कोर्ट ने इस अपराध से बरी करने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को निरस्त कर दिया। हालांकि अन्य धाराओं के तहत आरोपी को बरी करने के फैसले को बरकरार रखा है। जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की एकलपीठ ने 2 नवंबर 2026 को राज्य सरकार की अपील पर यह फैसला सुनाया।
मामले के अनुसार, पीड़िता के पिता ने 10 मई 2017 को पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी कि 24 जनवरी 2017 को सुबह 10 से 11 बजे के बीच आरोपियों ने उनकी नाबालिग बेटी को बहला-फुसलाकर अपने घर बुलाया। वहां उसके सिर पर सिंदूर लगाया और उसके साथ छेड़छाड़ की। आरोप था कि इस घटना का अश्लील वीडियो भी बनाया गया तथा आरोपी क्रमांक दो ने अपने भाई साधन कुंडू से शादी करने के लिए पीड़िता पर दबाव डाला। आरोपी साधन कुंडू ने शादी नहीं करने पर वीडियो वायरल करने की धमकी देकर ब्लैकमेल भी किया। पुलिस ने भारतीय दंड संहिता, पॉक्सो एक्ट और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज कर जांच के बाद चालान पेश किया था।
विशेष न्यायाधीश, पॉक्सो एक्ट भानुप्रतापपुर ने 15 फरवरी 2019 को दोनों आरोपियों को विभिन्न आरोपों से बरी कर दिया था। इसके खिलाफ राज्य सरकार ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 378 (1) के तहत हाईकोर्ट में अपील की। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पीड़िता के बयान को महत्वपूर्ण माना। पीड़िता ने गवाही में बताया था कि आरोपी ने उसे पकड़ा, मुंह बंद किया, कुर्ती ऊपर उठाई और उसके स्तनों को दबाया। कोर्ट ने कहा कि पीड़िता की यह गवाही भारतीय दंड संहिता की धारा 354 ए (1) (आई) के तहत यौन उत्पीड़न के अपराध को संदेह से परे साबित करती है। ट्रायल कोर्ट ने इस महत्वपूर्ण साक्ष्य का उचित मूल्यांकन नहीं किया था।
हालांकि हाईकोर्ट ने धारा 354 बी और 354 सी के तहत आरोपी को बरी करने के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष इन धाराओं के तहत अपराध के आवश्यक तत्व साबित नहीं कर सका। इसी तरह मोबाइल फोन में कथित अश्लील वीडियो के प्रसारण और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की प्रमाणिकता भी संदेह से परे साबित नहीं हुई। सुप्रीम कोर्ट के अर्जुन पंडितराव खोतकर मामले में दिए गए सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि वीडियो के स्रोत, हस्तांतरण और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की विश्वसनीयता स्थापित करने में कमियां हैं। वहीं, पीड़िता की घटना के समय उम्र 18 वर्ष से कम होने का पर्याप्त प्रमाण नहीं मिलने के कारण पॉक्सो एक्ट की धाराओं के तहत बरी करने का फैसला भी बरकरार रखा गया। अपील लंबित रहने के दौरान दूसरे आरोपी की 14 सितंबर 2025 को मृत्यु हो चुकी थी, इसलिए उसके खिलाफ अपील समाप्त कर दी गई।
हाईकोर्ट ने साधन कुंडू को धारा 354 ए (1) (आई) के तहत दोषी ठहराते हुए पहले जेल में बिताई गई पांच माह 30 दिन की अवधि को ही सजा माना और 15 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। जुर्माना तीन माह के भीतर जमा करना होगा। ऐसा नहीं करने पर उसे एक माह का अतिरिक्त सश्रम कारावास भुगतना होगा। कोर्ट ने निर्देश दिया कि जुर्माने की राशि जमा होने पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 395 के तहत पीड़िता को मुआवजे के रूप में दी जाए। राज्य की ओर से डिप्टी सरकारी अधिवक्ता आर.आर. पिथवा तथा आरोपी की ओर से अधिवक्ता मुकेश श्रीवास्तव ने पैरवी की।
