गलत वेतन निर्धारण से हुए अधिक भुगतान की वसूली पर रोक नहीं, यह राशि करदाताओं का पैसा है-हाई कोर्ट
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने गलत वेतन निर्धारण के कारण सेवानिवृत्त कर्मचारी को हुए 1.56 लाख रुपये के अधिक भुगतान की वसूली के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की एकलपीठ ने कहा कि सरकारी राशि का अधिक भुगतान होने पर उसकी वसूली की जा सकती है। यह राशि करदाताओं का पैसा है, न तो अधिक भुगतान करने वाले अधिकारी की और न ही इसे प्राप्त करने वाले कर्मचारी की।
रायपुर निवासी उमेश पाठक (68) उच्च शिक्षा विभाग में सहायक ग्रेड-3 के पद पर 31 अगस्त 1987 को नियुक्त हुए थे। बाद में उन्हें लेखापाल ग्रेड-2 और फिर लेखापाल ग्रेड-1 के पद पर पदोन्नति मिली। वे 31 अगस्त 2019 को सेवानिवृत्त हुए। विभाग ने वेतन निर्धारण और वेतनवृद्धि में गड़बड़ी बताते हुए 1,56,865 रुपये की वसूली का आदेश जारी किया था। इसके खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। हाईकोर्ट ने 16 मार्च 2026 को सुनवाई का अवसर दिए बिना जारी वसूली आदेश निरस्त कर विभाग को नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया था।
इसके बाद विभाग ने कर्मचारी को सुनवाई का अवसर देकर 11 जून 2026 को दोबारा वसूली का आदेश जारी कर दिया। इसे उमेश पाठक ने फिर चुनौती दी। उनके अधिवक्ता ऐश्वर्य दीवान ने दलील दी कि पूर्व में वसूली आदेश निरस्त होने के बाद उसी राशि की दोबारा वसूली नहीं की जा सकती। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट के रफीक मसीह फैसले के अनुसार सेवानिवृत्त कर्मचारी से इस तरह की वसूली अनुचित है। वहीं, शासन की ओर से अधिवक्ता अनादि शर्मा ने कहा कि पूर्व आदेश में केवल नए सिरे से सुनवाई कर नियमानुसार निर्णय लेने का निर्देश था, वसूली पर रोक नहीं लगाई गई थी।
हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सके कि राशि की वसूली से उन्हें असाधारण आर्थिक कठिनाई होगी। कोर्ट ने कहा कि अत्यधिक आर्थिक कठिनाई के आधार पर कुछ मामलों में वसूली से राहत मिल सकती है, लेकिन केवल पूर्व वसूली आदेश निरस्त होने से कर्मचारी को अधिक भुगतान की राशि अपने पास रखने का अधिकार नहीं मिल जाता। इन तथ्यों के आधार पर एकलपीठ ने उमेश पाठक की याचिका खारिज कर दी।
