न्यायालय केवल ईंट, पत्थर और कंक्रीट की इमारत नहीं-जस्टिस सिन्हा
संस्था को जितनी मजबूत मिली, उससे थोड़ी अधिक मजबूत छोड़कर जाना ही सबसे बड़ी जिम्मेदारी : जस्टिस रमेश सिन्हा
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधिपति न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा के सेवानिवृत्ति के अवसर पर गुरुवार को हाईकोर्ट परिसर में भावभीनी विदाई दी गई। अपने विदाई संबोधन में जस्टिस सिन्हा ने कहा कि मुख्य न्यायाधिपति की जिम्मेदारी केवल मामलों का निराकरण और न्याय प्रशासन तक सीमित नहीं है, बल्कि संस्था को मजबूत बनाना, न्यायिक अधोसंरचना विकसित करना, गरिमापूर्ण कार्य वातावरण तैयार करना और न्यायपालिका से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति में संस्था के प्रति अपनत्व की भावना पैदा करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। न्यायमूर्ति सिन्हा 29 मार्च 2023 को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के 15वें मुख्य न्यायाधीश बने थे और 4 सितंबर 2026 को सेवानिवृत्त हो रहे हैं।उन्होंने कहा कि न्यायालय केवल ईंट, पत्थर और कंक्रीट की इमारत नहीं है, बल्कि वह स्थान है जहां नागरिक अपनी आशाओं, शिकायतों और विधि के शासन में विश्वास के साथ न्याय की उम्मीद लेकर आते हैं। इसलिए न्यायिक अधोसंरचना ऐसी होनी चाहिए जो संस्था की गरिमा को प्रतिबिंबित करने के साथ प्रभावी न्याय प्रशासन के लिए अनुकूल वातावरण भी उपलब्ध कराए। उन्होंने अपने कार्यकाल में विकसित न्यायालय भवनों, आवासीय सुविधाओं और बार के लिए उपलब्ध कराई गई सुविधाओं को आने वाली पीढ़ियों के लिए उपयोगी बताया।जस्टिस सिन्हा ने न्यायाधीशों, रजिस्ट्री के अधिकारियों-कर्मचारियों और अधिवक्ताओं के कल्याण को विशेष महत्व देते हुए कहा कि किसी कर्मचारी या अधिकारी का वैध अधिकार कोई कृपा या विशेषाधिकार नहीं है। संस्था को ऐसे अधिकार बिना अनावश्यक विलंब और कठिनाई के उपलब्ध कराने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट से जुड़ा हर व्यक्ति यह महसूस करे कि “यह मेरी संस्था है”, जो उसके कार्य का सम्मान करती है, उसके योगदान को पहचानती है और उसके साथ निष्पक्ष व्यवहार करती है।उन्होंने बेंच और बार के संबंधों को न्याय व्यवस्था की मजबूती के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि दोनों न्याय वितरण प्रणाली के अभिन्न अंग हैं। उनके अनुसार स्वतंत्र, सशक्त और गरिमापूर्ण बार एक मजबूत न्यायपालिका के लिए आवश्यक है। उन्होंने हाईकोर्ट के न्यायाधीशों, रजिस्ट्री के अधिकारियों-कर्मचारियों, अधिवक्ताओं, राज्य शासन, विभिन्न विभागों, संबंधित एजेंसियों और जिला प्रशासन के सहयोग के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि उनके कार्यकाल का वास्तविक मूल्यांकन तभी होगा, जब उनके बाद संस्था “जितनी मजबूत मिली थी, उससे थोड़ी अधिक मजबूत” स्थिति में आगे बढ़े।
न्यायमूर्ति सिन्हा ने संस्थागत मूल्यों को सर्वोच्च बताते हुए कहा कि संस्थाएं केवल भौतिक आधारभूत ढांचे से नहीं, बल्कि निष्पक्षता, विश्वास, प्रतिबद्धता और न्याय के प्रति निष्ठा से मजबूत होती हैं। उन्होंने न्यायाधीशों, अधिकारियों और कर्मचारियों से संस्था के प्रति विश्वास बनाए रखने का आग्रह करते हुए कहा कि पद अस्थायी होते हैं, लेकिन संस्थाएं स्थायी रहनी चाहिए। उन्होंने कहा, “हमारी सर्वोच्च जिम्मेदारी एक सशक्त संस्था को पीछे छोड़कर जाना है।”महाधिवक्ता एवं अन्य वक्ताओं ने न्यायमूर्ति सिन्हा के न्यायिक योगदान, नेतृत्व और सेवाओं की सराहना की। महाधिवक्ता ने बताया कि मुख्य न्यायाधीश बनने से पहले जस्टिस सिन्हा लगभग 1,34,200 निर्णय दे चुके थे। 29 मार्च 2023 से 1 सितंबर 2026 तक उनके द्वारा कुल 50,228 मामलों का निराकरण किया गया, जिनमें एकल पीठ के 32,600 और खंडपीठ के 17,628 मामले शामिल हैं। इसके अलावा 369 से अधिक रिपोर्टेड AFR निर्णयों के माध्यम से उन्होंने राज्य के न्यायिक विधिशास्त्र के विकास में योगदान दिया।समारोह में हाईकोर्ट के न्यायाधीशगण, रजिस्ट्रार जनरल एवं रजिस्ट्री के अधिकारी-कर्मचारी, राज्य न्यायिक अकादमी के अधिकारी, अधिवक्तागण तथा न्यायिक बिरादरी के सदस्य उपस्थित रहे।
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न्यायमूर्ति सिन्हा ने न्याय-प्रदाय प्रणाली के प्रति जनविश्वास को और अधिक मजबूत किया-जस्टिस अग्रवाल
विदाई समारोह के अवसर पर अपने उद्बोधन में न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल ने मुख्य न्यायाधीश के विशिष्ट न्यायिक जीवन एवं अनुकरणीय नेतृत्व की सराहना करते हुए न्यायिक संस्था तथा न्याय-प्रदाय प्रणाली के प्रति उनके महत्वपूर्ण योगदान को स्मरण किया। उन्होंने कहा कि यह अवसर मात्र एक औपचारिक विदाई का अवसर नहीं, बल्कि एक ऐसे प्रतिष्ठित विधिवेत्ता के अमूल्य योगदान को स्वीकार करने और उसका सम्मान करने का अवसर है, जिनकी प्रज्ञा, सत्यनिष्ठा, प्रतिबद्धता एवं प्रशासनिक नेतृत्व ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की संस्था को सुदृढ़ करने के साथ-साथ न्याय-प्रदाय प्रणाली के प्रति जनविश्वास को और अधिक मजबूत किया।
