वक्फ संपत्तियों पर कथित अवैध कब्जे के खिलाफ पेश जनहित याचिका खारिज

०० कोर्ट ने कहा वर्ष 1959 और 1966 में किए गए कथित लेन-देन की वैधता तय नहीं किया जा सकता

०० याचिकाकर्ता को उचित फोरम में जाने की छूट

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वक्फ संपत्तियों पर कथित अवैध  कब्जे और अतिक्रमण से  संबंधित जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस  रविद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा कि मामले में वर्ष 1959 और 1966 में किए गए कथित लेन-देन की वैधता और उनके प्रभाव की जांच करनी होगी। इसके लिए विवादित तथ्यों और दस्तावेजों का विस्तृत परीक्षण आवश्यक है, जिसे  वर्तमान पी आई एल के असाधारण  अधिकार क्षेत्र में उचित रूप से तय नहीं किया जा सकता। याचिका में उठाए गए विवादों के समाधान के लिए वक्फ अधिनियम, 1995 के तहत सक्षम वक्फ ट्रिब्यूनल में प्रभावी वैधानिक उपाय उपलब्ध है।

याचिकाकर्ता सैय्यद हामिद अली की मुख्य शिकायत वक्फ संपत्ति के कुछ हिस्सों पर कथित अवैध कब्जे और अतिक्रमण तथा संबंधित अधिकारियों द्बारा संपत्ति की  सुरक्षा एवं उसे वापस लेने के लिए उचित कार्रवाई नहीं किए जाने को लेकर थी। याचिकाकर्ता ने कुछ सेल डीड की वैधता पर भी सवाल उठाते हुए कथित  कब्जाधारियों को संपत्ति से हटाने की मांग की थी।

डीबी ने कहा कि वक्फ अधिनियम में  वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा और अवैध  कब्जे से रिकवरी के लिए विशेष व्यवस्था है। धारा 51 वक्फ संपत्ति के अवैध  हस्तांतरण को निषिद्ध करती है, जबकि धारा 52 ऐसे हस्तांतरण की स्थिति में  संपत्ति की रिकवरी का प्रावधान करती है। इसी तरह धारा 54 और 55 अतिक्रमण  हटाने तथा बेदखली के आदेशों के  क्रियान्वयन से संबंधित हैं और धारा 83  वक्फ ट्रिब्यूनल के गठन का प्रावधान  करती है।

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1959 और 1966 में कब्जा और 2021 में शिकायत

अदालत ने पाया कि इस मामले में वर्ष  1959 और 1966 में किए गए कथित  लेन-देन की वैधता और उनके प्रभाव की जांच करनी होगी। इसके लिए विवादित तथ्यों और दस्तावेजों का विस्तृत परीक्षण आवश्यक है, जिसे  वर्तमान पी आई एल के असाधारण  अधिकार क्षेत्र में उचित रूप से तय नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि याचिका भले ही  जनहित याचिका के रूप में प्रस्तुत की गई हो, लेकिन इसकी वास्तविक प्रकृति  विशिष्ट संपत्तियों और व्यक्तिगत लेन-देन से जुड़े विवाद के निपटारे की है। बेंच ने यह भी महत्वपूर्ण माना कि कथित रूप से 1959  और 1966 में जमीन पर  कब्जा होने के बावजूद याचिकाकर्ता ने  संबंधित अधिकारियों से पहली बार  2021 में संपर्क किया। इन पुराने लेन-देन को चुनौती देने में हुई लंबी देरी का  याचिकाकर्ता संतोषजनक स्पष्टीकरण  नहीं दे सका। अदालत ने यह भी पाया कि रिट याचिका में उल्लेखित खसरा नंबरों और 19 अगस्त 2021 के रिप्रेजेंटेशन में दिए गए खसरा नंबरों में अंतर है। इन परिस्थितियों में विवादित तथ्यों का  निर्धारण जनहित याचिका में संभव नहीं माना गया।

अदालत ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता ने जनहित याचिका दायर करने के लिए आवश्यक सिक्योरिटी राशि जमा करने की अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया। हाईकोर्ट ने इसे भी याचिका पर विचार  नहीं करने का स्वतंत्र आधार माना। साथ ही अदालत ने कहा कि केवल यह  तथ्य कि संबंधित संपत्ति वक्फ संपत्ति है और कथित कब्जे का सार्वजनिक प्रभाव हो सकता है, हाईकोर्ट के असाधारण  अधिकार क्षेत्र के इस्तेमाल के लिए पर्याप्त नहीं है।

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मामले में प्रभावी वैकल्पिक उपाय उपलब्ध

इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए डिवीजन बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ता के पास सक्षम वक्फ ट्रिब्यूनल के समक्ष प्रभावी  वैकल्पिक कानूनी उपाय उपलब्ध है। याचिकाकर्ता हाईकोर्ट के असाधारण  अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने के लिए कोई असाधारण परिस्थिति भी स्थापित  नहीं कर सका। इसलिए इस जनहित याचिका को प्रभावी वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने और  आवश्यक सिक्योरिटी राशि जमा नहीं करने के आधार पर खारिज कर दिया गया।

kamlesh Sharma

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