हाईकोर्ट ने कहा आयकर विभाग में लंबे समय से कार्यरत कर्मचारियों को आउटसोर्सिंग में रखना मनमाना और भेदभाव वाला

00 ऐसी कार्रवाई भारत के संविधान के आर्टिकल 14 और 16 का उल्लंघन

00 कैट का आदेश निरस्त, याचिकाकर्ता नियमित होने का हकदार

बिलासपुर। जस्टिस संजय एस अग्रवाल एवं जस्टिस एके प्रसाद की डीबी ने आयकर विभाग में लंबे समय तक सेवा देने के बावजूद नियमित नहीं कर उनकी सेवा आउटसोर्सिग से लिए जाने के खिलाफ पेश याचिका में कैट के आदेश को निरस्त किया है। कोर्ट ने कहा याचिकाकर्ताओं की सर्विस खत्म करना, जबकि वे आउटसोîसग एजेंसियों के ज़रिए वही काम जारी रखते हैं और उसी तरह के कर्मचारियों को रेगुलराइज़ेशन देते हैं, मनमाना और भेदभाव वाला है। ऐसी कार्रवाई भारत के संविधान के आर्टिकल 14 और 16 का उल्लंघन करती है और इसलिए कानून में टिकने लायक नहीं है। याचिकाकर्ता लतेल प्रसाद यादव, राजबीर दास सहित अन्य इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में अलग-अलग तारीखों पर क्लास-4 पोस्ट जैसे डेली वेज एम्प्लॉई के तौर पर लगे थे। उन्होंने 10 से 15 वर्ष से भी अधिक समय तक लगातार अपनी ड्यूटी की, जिससे डिपार्टमेंट को बिना रुके और संतोषजनक सर्विस दी। उनकी ड्यूटी के दौरान, रेस्पोंडेंट अधिकारियों ने कई मौकों पर याचिकाकर्ताओं की सर्विस को माना और रेगुलराइज़ेशन के लिए उनके नामों की भी सिफारिश की। वर्ष 2011-2012 में विभाग ने 04.07.2011 और 25.07.2011 के ऑर्डर जारी करके पॉलिसी में बदलाव किया, जिसके तहत डेटा एंट्री, टाइपिग, सफाई और सिक्योरिटी जैसी सर्विसेज़ को अलग-अलग डेली वेज वर्कसã को रखने के बजाय कॉन्ट्रैक्ट एजेंसियों के ज़रिए आउटसोर्स करने का निर्देश दिया गया। इसके बाद 14.03.2012 का एक और निर्देश जारी किया गया जिसमें याचिकाकर्ताओं समेत मौजूदा डेली वेज वर्कसã को आउटसोîसग एजेंसियों के ज़रिए कॉन्ट्रैक्ट वाली नौकरी के सिस्टम में बदलने का आदेश दिया गया। इसके खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल, जबलपुर बेंच में आवेदन देकर नई पॉलिसी को चुनौती दी। कैट ने आवेदन को रद्द कर दिया। कैट के आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में याचिका पेश की। जस्टिस संजय एस अग्रवाल एवं जस्टिस एके प्रसाद की डीबी में याचिकाओं पर संयुक्त रूप से सुनवाई हुई। इसके साथ कोर्ट ने इस संबंध में याचिकाकर्ताओं के पक्ष में आदेश देते हुए उन्हें नियमित होने का हकदार माना व कैट के आदेश को रद्द किया है। डीबी ने आदेश में कहा सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल, जबलपुर बेंच का 11.10.2013 को पास किया गया विवादित कॉमन ऑर्डर कानून की नज़र में सही नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि यह उमा देवी (ऊपर) में बताए गए सिद्धांतों के बहुत ज़्यादा सख़्त और मैकेनिकल इस्तेमाल पर आधारित है, बिना कानून के बाद के विकास और मौजूदा मामले की असलियत को समझे। ट्रिब्यूनल पिटीशनर्स की लंबी, लगातार और बिना रुकावट वाली सर्विस, उनके द्बारा किए गए कामों का हमेशा रहने वाला नेचर, उनके रेगुलराइज़ेशन के लिए डिपार्टमेंट द्बारा की गई सिफारिशों और बाद में सुप्रीम कोर्ट के आधिकारिक फैसलों को ध्यान में रखने में नाकाम रहा है। पिटीशनर्स की पहली कैटेगरी, यानी जो सर्विस में बने हुए हैं, का सवाल है, यह कोर्ट मानता है कि रेगुलराइज़ेशन के उनके दावे को सिर्फ इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि उन्होंने 10.04.2006 तक दस साल की सर्विस पूरी नहीं की थी। रिकॉर्ड में मौजूद मटीरियल से साफ़ पता चलता है कि उन्होंने दशकों से लगातार सर्विस दी है, वे परमानेंट और हमेशा रहने वाले काम कर रहे हैं, और उनकी नियुक्ति, ज़्यादा से ज़्यादा, गैर-कानूनी होने के बजाय प्रोसेस से जुड़ी अनियमितता से ग्रस्त है। सुप्रीम कोर्ट के बाद के फैसलों में लगातार इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि ऐसे कर्मचारी रेगुलराइज़ेशन के लिए सही और बराबर का फ़ायदा पाने के हकदार हैं और उन्हें बहुत ज़्यादा टेक्निकल वजहों से ऐसे फ़ायदे से मना नहीं किया जा सकता।

kamlesh Sharma

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