व्यवहार न्यायालय ने धोखाधड़ी से प्राप्त न्यायिक आदेश को शून्य किया
०० जीवित व्यक्ति को सिविल मृत्यु घोषित करने का मामला
बिलासपुर। धोखाधड़ी द्बारा प्राप्त कोई भी न्यायिक आदेश न तो अंतिमता प्राप्त कर सकता है और न ही उसे समय की सीमा अथवा प्रक्रिया की आड़ में संरक्षित किया जा सकता है। अत: ऐसी डिक्री न केवल शून्य होती है, बल्कि उससे कोई वैधानिक अधिकार उत्पन्न नहीं हो सकता।
विधि का यह भी सुस्थापित सिद्धांत है कि जब कोई डिक्री धोखाधड़ी द्बारा प्राप्त की गई हो, तब उसे निरस्त कराने हेतु पृथक वाद अथवा अपील की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि ऐसी डिक्री विधि की दृष्टि में शून्य होती है और उसे किसी भी उपयुक्त कार्यवाही में अमान्य घोषित किया जा सकता है।
द्बितीय व्यवहार न्यायाधीश ने कनिष्ठ श्रेणी बिलासपुर ने धोखाधड़ी कर जीवित व्यक्ति को लापता बताकर सिविल मृत्यु की डिक्री का प्रयोग कर राजस्व रिकार्ड से नाम विलोपित कराने के खिलाफ पेश वाद में कहा कि सर्वोच न्यायालय द्बारा प्रतिपादित न्यायदृष्टांत
में यह न्यायालय यह निष्कर्ष पर पहुँचती है कि वादी रामगोपाल न्यायालय से पारित निर्णय दिनांक 14.०6.2०12 के समय जीवित था एवं सिविल मृत्यु की उपधारणा प्रतिवादीगण द्बारा न्यायालय के समक्ष असत्य एवं महत्वपूर्ण तथ्यों को छुपाते हुए डिक्री प्राप्त की गई थी। प्रतिवादीगण द्बारा वादी रामगोपाल की सिविल मृत्यु की डिक्री का प्रयोग अवैध बंटवारा प्राप्त करने हेतु किया गया। वर्तमान में वादी वही रामगोपाल है जिसकी व्यवहार बाद में सिविल मृत्यु की घोषणा की गई थी एवं वह आज दिनांक को जीवित है। व्यवहार वाद में पारित निर्णय व डिक्री न्यायालय के साथ छल करके प्राप्त की गई थी तथा वह वादी रामगोपाल पर बंधनकारी नहीं है।
मामला यह है कि बिलासपुर जिला के बिल्हा क्ष्ोत्र के ग्राम बसिया निवासी आनंद राम व कालिका प्रसाद सगे भाई थ्ो। आनंदराम की शादी अमोलाबाई से हुई थी। दोनों भाईयों के नाम ग्राम बसिया में 6.222 एकड़ भूमि संयुक्त खाता में है। आनंदराम की मौत के बाद राजस्व रिकार्ड में उनकी पत्नी अमोला बाई का नाम चढ़ाया गया। आनंदराम एवं अमोलाबाई की एक पुत्री थी रूप बाई। रूप बाई की शादी चांपा निवासी राजकुमार से हुई। उनका एक पुत्र रामगोपाल गौरहा है। दूसरी ओर कालिका प्रसाद के चार संतान रूपराम, बेनीराम, बिहारीलाल एवं पुत्री निर्मला है। उक्त संपत्ति का दो हिस्सा होना था। इसमें रूपराम एवं अन्य ने रागगोपाल गौरहा को लापता बता सिविल मृत्यु डिक्री प्रा’ कर राजस्व रिकार्ड से रामगोपाल का नाम विलोपित करा दिया। अष्टम व्यवहार न्यायाधीश ने 2०14 को उक्त आदेश पारित किया था। इस बात की जानकारी होने पर रामगोपाल गौरहा ने सिविल वाद पेश किया। द्बितीय व्यवहार न्यायाधीश कनिष्ठ श्रेणी रिया चक्रवर्ती ने वाद को स्वीकार करते हुए सिविल मृत्यु डिक्री को शून्य किया है।
मामले में वादी राम गोपाल गौरहा ने छत्तीसगढ़ शासन से प्रा’ पेंशन के रिकार्ड, वोटर आईडी, आधार कार्ड, ड्राईविंग लाइसेंस सहित अन्य दस्तावेज प्रस्तुत कर जीवित होने का साक्ष्य प्रस्तुत किया था। इस आधार पर कोर्ट ने वादी के सिविल मृत्यु डिक्री को अवैध एवं छलपूर्वक प्राप्त करना पाया है।
