निजी स्वार्थ के लिए क़ानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग, हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर 50 हजार रु जुर्माना लगाया

बिलासपुर। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा  व जस्टिस रविन्द्र कुमार अग्रवाल की युगलपीठ ने व्यक्तिगत लाभ पाने जनहित याचिका पेश किये जाने पर टिप्पणी करते हुए कहा कि “एक जनहित याचिका में, जब याचिकाकर्ता स्वयं विषय-वस्तु से संबंधित विवादों में एक पक्षकार हो, और उसी मुद्दे पर न्यायालय द्वारा पहले ही एक अन्य जनहित याचिका जिसमें स्वप्रेरणा से संज्ञान भी शामिल है, में विचार किया जा चुका हो, तो बाद की याचिका को एक वास्तविक जनहित याचिका नहीं माना जा सकता। ऐसा अनुरोध, व्यक्तिगत उद्देश्य और प्रतिशोध से प्रेरित होने के कारण,

अत्यधिक जुर्माने के साथ खारिज किया जा सकता है। इसके साथ कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर 50 हजार रु जुर्माना लगाते हुए खारिज किया है। कोर्ट ने उक्त राशि विशिष्ट दत्तक ग्रहण एजेंसी (SAA), गरियाबंद (छ.ग.) और विशिष्ट दत्तक ग्रहण एजेंसी (SAA), बालोद (छ.ग.) को प्रेषित किया जाएगा

मामला यह है कि क्षेत्रीय ट्रांसपोर्ट वेल्फेयर एसोसिएशन सीपत ने एनटीपीसी लिमिटेड सीपत के फ्लाई ऐश से भरे ओवरलोड ट्रक को न छोड़े और इसके अलावा फ्लाई ऐश से भरे ट्रक पर तिरपाल से ढक कर परिवहन करने, ओवरलोड ट्रक को बिलासपुर-सीपत में चलने की अनुमति नहीं देने की मांग को लेकर जनहित याचिका पेश की थी।

मामले में शासन व एनटीपीसी ने जवाब पेश कर कहा कि याचिका (जनहित याचिका) संख्या 37/2024 पहले से ही इस न्यायालय के समक्ष लंबित है जिसमें वर्तमान याचिका में उठाया गया मुद्दा सक्रिय रूप से विचाराधीन है, और इस न्यायालय ने इस मामले में स्वतः संज्ञान भी लिया है। इसके बावजूद, याचिकाकर्ता ने वर्तमान जनहित याचिका दायर करने का विकल्प चुना है, जिससे पता चलता है कि यह याचिका किसी वास्तविक सार्वजनिक उद्देश्य के लिए नहीं, बल्कि केवल अपने निजी लाभ के लिए दायर की गई है। ऐसा व्यवहार कानूनी प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग है और वर्तमान जनहित याचिका को तुरंत खारिज किए जाने योग्य बनाता है। एनटीपीसी की ओर से उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि वर्तमान रिट याचिका एक प्रेरित मुकदमेबाजी के अलावा और कुछ नहीं है

जनहित याचिका के रूप में प्रच्छन्न मुकदमा। याचिकाकर्ता पेशे से एक ट्रांसपोर्टर है और उसका एनटीपीसी से परिवहन अनुबंध प्राप्त करने में प्रत्यक्ष व्यावसायिक हित है। यह निहित स्वार्थ प्रकट करता है कि वर्तमान याचिका

किसी बड़े सार्वजनिक हित की पुष्टि के लिए दायर नहीं की गई है, बल्कि केवल

याचिकाकर्ता के अपने व्यावसायिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए दायर की गई है। वास्तव में, याचिका में एक मूलभूत दोष है क्योंकि याचिका के मुख्य भाग में प्राधिकरण का कोई खुलासा नहीं किया गया है।

याचिकाकर्ता का आचरण भी उसे इस न्यायालय के न्यायसंगत क्षेत्राधिकार का प्रयोग करने से रोकता है। याचिकाकर्ता का इस क्षेत्र में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगाड़ने का इतिहास रहा है, जिसके कारण उसके विरुद्ध 11.07.2025 को बिलासपुर जिले के सीपत पुलिस स्टेशन में विधिवत एक प्राथमिकी दर्ज की गई थी।

नवकार ग्लोबल के पर्यवेक्षक गंगाधर सूर्यवंशी द्वारा भारतीय दंड संहिता की धारा 191(2), 126(2), 296 और

351(2) के तहत दंडनीय अपराधों के लिए। जो वादी ऐसे पूर्ववृत्त और प्रत्यक्ष व्यक्तिगत लाभ को उद्देश्य मानकर इस न्यायालय में आता है, उसे जनहित याचिका के असाधारण उपाय का दुरुपयोग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस रविन्द्र कुमार अग्रवाल की युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग के रूप में शुरू से ही खारिज किया जा सकता है। न्यायालयों को, प्रथम दृष्टया, किसी जनहित याचिका पर विचार करने से पहले याचिकाकर्ता की साख की पुष्टि करनी चाहिए। न्यायालय को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जनहित याचिका दायर करने के पीछे कोई व्यक्तिगत लाभ, निजी उद्देश्य या अप्रत्यक्ष उद्देश्य न हो। जनहित में अधिकार क्षेत्र निजी व्यक्तियों द्वारा अपने निहित स्वार्थों को पूरा करने के लिए दुरुपयोग का स्रोत बन सकता है।

याचिकाकर्ता कानून-व्यवस्था की समस्याओं में संलिप्तता, जिसके परिणामस्वरूप 11.07.2025 को पुलिस स्टेशन सीपत, जिला-बिलासपुर में एक प्राथमिकी दर्ज की गई नवकार ग्लोबल के पर्यवेक्षक गंगाधर सूर्यवंशी की रिपोर्ट पर एशोसिएशन के अध्यक्ष शत्रुघन कुमार के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 191(2), 126(2), 296 और 351(2) के तहत दंडनीय अपराधों के लिए, सामूहिक रूप से दुर्भावना और एक अप्रत्यक्ष प्रेरणा स्थापित होती है। जनहित की आड़ में निजी विवादों या व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता के अखाड़े में नहीं डाला जा सकता है। (सुप्रा) में बार-बार ज़ोर दिया है, एक जनहित याचिका स्वच्छ हाथों और जनहित की रक्षा के सच्चे इरादे से दायर की जानी चाहिए, अन्यथा यह क़ानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा। वर्तमान याचिका पूरी तरह से प्रक्रिया का दुरुपयोग है। इसके साथ कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर 50 हजार रु जुर्माना लगाया है। उक्त राशि न्यायालय की रजिस्ट्री में जमा किया जाएगा और इसे विशिष्ट दत्तक ग्रहण एजेंसी (SAA), गरियाबंद (छ.ग.) और विशिष्ट दत्तक ग्रहण एजेंसी (SAA), बालोद (छ.ग.) को प्रेषित किया जाएगा ।

 

kamlesh Sharma

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