संदेह कितना भी प्रबल क्यों न हो सबूत का स्थान नहीं ले सकता-हाईकोर्ट

०० बस्तर के कथित नक्सलियों की दोषमुक्ति के खिलाफ पेश शासन की अपील खारिज

बिलासपुर। जस्टिस संजय एस अग्रवाल एवं जस्टिस राधाकिशन अग्रवाल की डीबी ने नक्सलियों से कथित टिफिन बम बरामदगी के मामले में निचली अदालत से दोषमुक्त किए जाने के खिलाफ पेश अपील को यह कहते हुए खारिज किया कि अभियोजन पक्ष का मामला संदेह पर आधारित था, संदेह चाहे कितना भी प्रबल क्यो न हो वह सबूत का स्थान नहीं ले सकता है। इसके साथ डीबी ने निचली अदालत के निर्णय को यथावत रखते हुए शासन की अपील को खारिज किया है।

मामला यह है कि 10 सितंबर 2015 को सुबह लगभग 4:30 बजे, दरभा पुलिस स्टेशन के थाना प्रभारी, पुलिस कर्मचारियों और एसटीएफ की एक गश्ती टीम के साथ, फरार आरोपियों की तलाश में कोलेंग, चंदामोटा और बदंगपाल क्षेत्रों की ओर बढ़े। 14 सितंबर 2015 को, गश्त से लौटते समय, टीम को भद्रिमाहू गाँव के पास झाड़ियों के पीछे छिपे दो व्यक्ति मिले। उन्हें पकड़ लिया गया और पूछताछ करने पर, आरोपियों ने खुलासा किया कि वे प्रतिबंधित माओवादी संगठन के सक्रिय सदस्य हैं। पुलिस ने आरोपी मुचाकी देवा द्बारा दी गई जानकारी के आधार पर, एक टिफिन बम, बैटरियाँ और तार बरामद किया। विज्जा पोडियामी के घर के पिछवाड़े से एक टिफिन बम बरामद किया गया और उसे भी हिरासत में लिया गया। कार्रवाई के उपरांत पुलिस ने कथित नक्सली मुचाकी देवा एवं विज्जा पोडियाम को गिरफ्तार कर इनके खिलाफ राज्य सुरक्षा कानून अधिनियम के तहत प्रकरण दर्ज कर न्यायालय में चालन पेश किया। जगदलपुर विश्ोष न्यायाधीश ने गवाह जांच अधिकारी एवं गश्ती दल में शामिल हेड कांस्टेबल, कांस्टेबल के बयान में विरोधाभाष एवं कथित रूप से जप्त’ विस्फोटक की एफएसएल रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं करने पर दोनों कथित नक्सलियों को दोषमुक्त किया। इसके खिलाफ राज्य शासन ने 2016 में अपील पेश की थी।

कोर्ट ने आदेश में कहा

अपील पर जस्टिस संजय एस अग्रवाल एवं जस्टिस राधाकिशन अग्रवाल की डीबी में सुनवाई हुई। डीबी ने शासन एवं प्रतिवादियों के अधिवक्ता व प्रकरण में प्रस्तुत दस्तावेज के अवलोकन उपरांत अपने आदेश में कहा कि अभियोजन पक्ष के मामले को जैसा है वैसा ही लिया जाए, तो ऐसा प्रतीत होता है कि अभियोजन पक्ष का पूरा मामला संदेह पर आधारित था, हालाँकि, संदेह, चाहे कितना भी प्रबल क्यों न हो, सबूत का स्थान नहीं ले सकता। निचली अदालत ने अभियोजन पक्ष द्बारा प्रस्तुत साक्ष्यों पर विस्तृत चर्चा की है और संपूर्ण साक्ष्यों का विश्लेषण करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँची। अभिलेखों में ऐसा कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं है जिससे यह स्थापित हो सके कि अभियुक्तों के पास संबंधित समय पर विस्फोटक पदार्थ था और अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि जब्त किया गया पदार्थ एक विस्फोटक पदार्थ था। इसके साथ कोर्ट ने शासन की अपील को खारिज किया है।

जांच अधिकारी ने कुछ कहा व गवाहों ने कुछ

मामले की सुनवाई के दौरान गवाहों के बयान में विरोधाभाष रहा। जांच अधिकारी ने अदालत में कहा

कि 14 सितंबर 2015 को गश्त से लौटते समय, उन्होंने अन्य पुलिस कर्मियों के साथ भद्रीमहू गाँव के पास झाड़ियों के पीछे छिपे दो व्यक्तियों को पाया और उसके बाद, उन्होंने आरोपियों को पकड़ लिया। आगे कहा कि भद्रिमाहू गाँव में फुटपाथ के किनारे बैठकर सारी कागजी कार्रवाई की थी। इसके विपरीत, हेड कांस्टेबल और कांस्टेबल, तलाशी दल के सदस्य और कथित जप्ती और ज्ञापन की कार्यवाही के गवाहों ने अपनी जिरह में स्वीकार किया है कि कथित जप्ती और ज्ञापन की सभी कागजी कार्रवाई पुलिस थाने में तैयार की गई थी और सभी संबंधित दस्तावेजों पर उनके द्बारा पुलिस थाने में ही हस्ताक्षर किए गए थे, न कि मौके पर। ये विरोधाभासी बयान जब्ती की कार्यवाही की वास्तविकता और वैधता पर गंभीर संदेह पैदा करते हैं। इसके अलावा जांच अधिकारी ने कहा है कि टिफिन बम उस स्थान पर लगाया गया था जहाँ से आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था, लेकिन इसके विपरीत कांस्टेबल ने कहा है कि टिफिन बम उस स्थान से लगभग 1 किमी आगे बैटरी तार सहित टिफिन बम सड़क से 15-20 मीटर आगे स्थित एक गड्ढे से बरामद किया गया था। ये विरोधाभासी

बयान आरोपी व्यक्तियों से कथित वस्तुओं की जप्ती के सटीक स्थान के बारे में भी गंभीर संदेह पैदा करते हैं। कथित वस्तुएं किस प्रकार या कहाँ से बरामद की गईं।

kamlesh Sharma

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