दिव्यांग से अनाचार के आरोपी को 10 वर्ष कठोर कारावास न्याय के उद्देश्यों को पूरा करेगी
- 00 अभियोजन पक्ष पीड़िता को नाबालिग साबित करने में विफल रहा

बिलासपुर। हाई कोर्ट ने पीड़िता की उम्र 18 वर्ष से कम साबित नहीं होने के कारण गूँगी लड़की से दुष्कर्म के आरोपी की 20 वर्ष की कैद को 10 वर्ष के कठोर कारावास में बदला है।
उत्तर बस्तर कांकेर जिला अन्तर्ग निवासी 17 वर्षीय गूँगी लड़की 23 नवंबर 2018 को घर में नहीं थी। उसकी मौसी तलाश करते हुए मोहल्ले में आवाज दी। गांव के महेंद्र जैन के घर से चूड़ियों की आवाज आने पर उसने वहां जाकर आवाज दी। कुछ देर बाद दरवाजा खुला व अंदर से पीड़िता बाहर आई वह काफी डरी हुई, बाल बिखरे थे व लेगीज हाथ में रखी थी। गूँगी होने पर उसने रोरोकर इशारों में घटना की जानकारी दी। पीड़िता की मौसी जब अंदर गई तो देखी कि आरोपी अपने कपड़ा ठीक करते हुए छुपाने का प्रयास कर रहा था। पीड़िता की मौसी ने घटना की 24 नवंबर को रिपोर्ट लिखाई। पुलिस ने मेडिकल जांच व साक्ष्य एकत्र कर न्यायालय में चालान पेश किया। विशेष न्यायाधीश पाक्सो ने आरोपी को 342 में एक वर्ष एवं 376 पाक्सो एक्ट में 20 वर्ष कठोर कैद व 5000 रु अर्थदंड की सजा सुनाई। इसके खिलाफ आरोपी ने हाई कोर्ट में अपील पेश की।
अपील में जस्टिस रजनी दुबे एवं जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की डीबी में सुनवाई हुई। डीबी ने अभियोजन पक्ष द्वारा अभियोक्ता की नाबालिगता साबित करने के लिए प्रस्तुत किए गए साक्ष्य की प्रकृति और गुणवत्ता को देखते हुए, कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा है कि घटना की तिथि पर अभियोक्ता की आयु 18 वर्ष से कम थी।
इस प्रकार, अपीलकर्ता के विरुद्ध पॉक्सो अधिनियम के अंतर्गत कोई अपराध नहीं बनता। हालाँकि, जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, अपीलकर्ता को
निचली अदालत द्वारा भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)((च)(क) के अंतर्गत सही रूप से दोषी ठहराया गया है।
इसके अंतर्गत न्यूनतम सजा 10 वर्ष है ।
अतः, मामले के तथ्यों और परिस्थितियों, अभियुक्त/अपीलकर्ता की उम्र
और उसके किसी आपराधिक इतिहास को देखते हुए, यह अदालत का मत है कि 10 वर्ष के कठोर कारावास और जुर्माने की सजा न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति करेगी।
