न्याय प्रदान करने वाली प्रणाली जाति, धर्म, पंथ, रंग नहीं जानती-हाईकोर्ट
00 अत्याचार निवारण अधिनियम के आरोपित अधिवक्ता को जमानत नही देने पर याचिका पेश की गई थी
बिलासपुर। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा ने एक अधिवक्ता को अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत दर्ज मामले में पीठासीन अधिकारी द्बारा जमानत नहीं दिए जाने पर प्रकरण को अन्य अदालत में सुनवाई हेतु प्रेषित करने आरोपित वकील द्वारा पेश याचिका को यह कहते हुए खारिज किया कि संभावित आशंका का मात्र अनुमान किसी भी मामले को एक न्यायालय से दूसरे न्यायालय में स्थानांतरित करने का आधार नहीं होना चाहिए । केवल अत्यंत विशेष परिस्थितियों में, जब ऐसे आधार लिए जाते हैं, न्यायालय को किसी मामले को स्थानांतरित करने के लिए मौजूद कारणों का पता लगाना चाहिए, अन्यथा नहीं न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा और उनके आत्मसम्मान, आत्मविश्वास और सबसे बढ़कर न्याय संस्था की गरिमा को बनाए रखा जा सके। न्याय प्रदान करने वाली प्रणाली जाति, धर्म, पंथ, रंग नहीं जानती , यह काले और सफ़ेद, अर्थात सत्य और असत्य के सिद्धांत पर चलने वाली एक प्रणाली है। जो भी अनुचित है, उसकी पहचान की जाती है और उसके साथ उचित व्यवहार किया जाता है और जो भी अच्छा है उसे बरकरार रखा जाता है। जो भी अन्याय से पीड़ित होता है, उसे न्याय दिलाने का प्रयास किया जाता है और इसे न्याय प्रदान करना कहा जाता है। वर्तमान में देश में न्याय प्रदान करने की प्रचलित प्रणाली के विभिन्न स्तर हैं। जमीनी स्तर पर, न्यायालयों को आमतौर पर ’’जिला न्यायपालिका’’ के रूप में जाना जाता है और वे न्याय प्रशासन का आधार बनते हैं। कभी-कभी यह कहा जाता है कि जिला न्यायपालिका न्याय प्रशासन की रीढ़ है। केवल एक प्रतिकूल आदेश के आधार पर पक्षपात का आरोप स्थानांतरण को उचित ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं है, जब तक कि इसकी पुष्टि प्रासंगिक सामग्री से न हो, जो कि वर्तमान मामले में नहीं है। इसके अलावा, अभियुक्त और शिकायतकर्ता दोनों ही अधिवक्ता हैं। इसके साथ कोर्ट ने याचिका को खारिज किया है।
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मामला यह है
पांच वर्ष पूर्व विधि की अनुसूचित जनजाति की छात्रा के साथ ओबीसी वर्ग के वकील ने शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाया। इससे वह गर्भवती हो गई। इस मामले में पीड़िता ने थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई। उसने अपनी रिपोर्ट में मुख्य आरोपी वकील के अलावा प्रदेश के जिला न्यायालय में प्रैक्टिस करने वाले अन्य वकीलों के खिलाफ भी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज कराई है। इस मामले में पुलिस ने एक अधिवक्ता को अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत गिरफ्तार कर विचारण न्यायालय में पेश किया। विचारण न्यायालय ने जमानत आवेदन खारिज कर जेल दाखिल का आदेश दिया। इस पर अधिवक्ता ने पीठासीन अधिकारी पर संदेह व्यक्त कर प्रकरण को विचारण के लिए अन्य कोर्ट में भेजने याचिका पेश की थी। वर्तमान में पीड़िता एवं आरोपी गण विधि व्यवसाय कर रहें। इस मामले में पीड़िता ने अन्य वकीलों के खिलाफ शिकायत की है।
