एनटीपीसी कोरबा में 44 साल पहले हुए 20 लाख रुपये के कथित घोटाला,
00 आरोपियों की दोषमुक्ति के खिलाफ पेश सीबीआई की अपील खारिज
बिलासपुर। एनटीपीसी कोरबा में बिना सामान की आपूर्ति के करीब 20 लाख रुपये का भुगतान लेने के कथित 44 साल पहले के मामले में हाईकोर्ट ने मेसर्स अटलांटिक इंजीनियरिंग सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड के दो पूर्व निदेशकों एसएस संधू और डीएस संधू को राहत दी है। जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की सिंगल बेंच ने दोनों को बरी किए जाने के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ आपराधिक साजिश और धोखाधड़ी के आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है।
अभियोजन के अनुसार, वर्ष 1981 में अटलांटिक इंजीनियरिंग सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड को एनटीपीसी के कोरबा सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट के तीसरे चरण में वेंटिलेशन सिस्टम और वातानुकूलन संयंत्र की आपूर्ति एवं स्थापना का ठेका मिला था। इसके तहत 24 अप्रैल 1981 से उपकरणों की आपूर्ति शुरू हुई। भुगतान के लिए 17 नवंबर 1981 को लेटर ऑफ क्रेडिट जारी किया गया था। सीबीआई को सूचना मिली थी कि जनवरी से नवंबर 1982 के बीच कंपनी के निदेशकों और एनटीपीसी के कुछ अधिकारियों ने कथित साजिश के तहत बिना सामान की आपूर्ति किए करीब 20 लाख रुपये का भुगतान करा लिया। इसके लिए कथित तौर पर फर्जी बिल और वाउचर का इस्तेमाल किया गया, जिससे एनटीपीसी को आर्थिक नुकसान हुआ।
सीबीआई ने वर्ष 1986 में प्राथमिकी दर्ज कर जांच की और आरोपियों के खिलाफ चालान पेश किया। मामले में विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट, सीबीआई, रायपुर ने 10 जनवरी 2018 को एसएस संधू, डीएस संधू सहित आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 420 और 120-बी के तहत दोषी ठहराया था। हालांकि, अपील पर विशेष न्यायाधीश, सीबीआई मामलों की विशेष अदालत, रायपुर ने 13 सितंबर 2019 को दोषसिद्धि का फैसला निरस्त कर आरोपियों को बरी कर दिया। इसी फैसले को चुनौती देते हुए केंद्र सरकार की ओर से सीबीआई ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। मुकदमे की सुनवाई के दौरान तीन अन्य आरोपियों की मृत्यु हो गई थी।
बचाव पक्ष का कहना था कि एनटीपीसी के अधिकारियों के साथ बैठक के बाद भुगतान में सामने आई विसंगतियों का समाधान कर लिया गया था। कथित रूप से अधिक भुगतान की गई राशि वापस की गई और बाद में संबंधित सामान की आपूर्ति भी कर दी गई। आरोपियों ने यह भी कहा कि उन्होंने कभी धोखाधड़ी नहीं की और न ही कोई फर्जी बिल जारी किया। बचाव पक्ष के अनुसार, सामान की आपूर्ति से पहले और उसके गंतव्य पर पहुंचने के बाद एनटीपीसी के अधिकारी उसका सत्यापन करते थे। कंपनी ने सिंगरौली स्थित एनटीपीसी का करीब 1.40 करोड़ रुपये का ठेका भी बिना किसी शिकायत के पूरा किया था।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आपराधिक साजिश साबित करने के लिए आरोपियों के बीच किसी गैरकानूनी कार्य को अंजाम देने के समझौते का विश्वसनीय साक्ष्य होना जरूरी है। इस मामले में एनटीपीसी के उन अधिकारियों को आरोपी नहीं बनाया गया, जिनकी कथित भूमिका लेन-देन में महत्वपूर्ण थी। अभियोजन पक्ष ऐसा कोई प्रत्यक्ष या परिस्थितिजन्य साक्ष्य पेश नहीं कर सका, जिससे आरोपियों के बीच आपराधिक साजिश साबित हो सके। कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि कथित लेन-देन के संबंध में एनटीपीसी की ओर से कोई शिकायत नहीं की गई थी और घटना के कई वर्ष बाद प्राथमिकी दर्ज हुई थी। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शिकायत का अभाव और प्राथमिकी में देरी अपने आप में अभियोजन समाप्त करने के पर्याप्त आधार नहीं हैं।
कोर्ट ने कहा कि लेटर ऑफ क्रेडिट की अवधि बढ़ाने, पक्षकारों के बीच हुई बैठकों, खातों के मिलान, अतिरिक्त भुगतान की वसूली या समायोजन और बाद में सामान की आपूर्ति जैसे तथ्यों से आरोपियों को संदेह का लाभ देने का आधार बनता है। अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि आरोपियों ने आपराधिक साजिश के तहत काम किया या एनटीपीसी को बेईमानी से भुगतान करने के लिए प्रेरित किया। हाईकोर्ट ने अपीलीय अदालत के फैसले में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं पाया और सीबीआई की अपील खारिज करते हुए दोनों पूर्व निदेशकों को बरी करने का फैसला बरकरार रखा।
