क्रूरता और परित्याग साबित नहीं कर सके पति, हाई कोर्ट ने तलाक की अपील खारिज की
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने पति की ओर से क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक की मांग वाली अपील खारिज कर दी। जस्टिस पार्थ प्रतिम साहू और जस्टिस सुषमा सावंत की डिवीजन बेंच ने कहा कि पति पत्नी पर लगाए गए आरोपों को ठोस साक्ष्यों से साबित नहीं कर सका। लंबे समय तक अलग रहने मात्र से पत्नी द्वारा परित्याग नहीं माना जा सकता।
जगदलपुर निवासी पति ने पत्नी के खिलाफ फैमिली कोर्ट, बस्तर में तलाक की अर्जी लगाई थी। पति का आरोप था कि पत्नी अपमानित करती थी, झगड़ा करती थी और झूठे आपराधिक मामलों में फंसाने की धमकी देती थी। उसने यह भी कहा कि पत्नी के व्यवहार से परेशान होकर वह जुलाई 2018 से अलग रह रहा है।
पत्नी ने आरोपों को नकारते हुए कहा कि पति ने ही उसे और बच्चों को उपेक्षित किया तथा उनके साथ हिंसा और दुर्व्यवहार किया। हाई कोर्ट ने पाया कि दंपती के बालिग बच्चों ने भी पिता के नियमित घर आने और खाना खाने की बात कही थी। इससे पति के लगातार अलग रहने के दावे को समर्थन नहीं मिला।
बेंच ने स्पष्ट किया कि तलाक के लिए मानसिक क्रूरता और परित्याग के कानूनी आधारों को साबित करना जरूरी है। आपसी सहमति से तलाक की पूर्व कार्यवाही में सहमति वापस लेना अपने आप में क्रूरता नहीं है। इसी तरह, विवाह का पूरी तरह टूट जाना भी हिंदू विवाह अधिनियम के तहत हाई कोर्ट में तलाक देने का स्वतंत्र आधार नहीं है।
हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के 8 दिसंबर 2023 के फैसले को बरकरार रखते हुए पति की अपील खारिज कर दी।
पति-लव रिलेशनशिप में रहने के बाद शादी की
मामले में पति-पत्नी दोनों लव रिलेशन में रहे। इसके बाद दोनों परिवार की सहमति से 1992 में हिंदू रीतिरिवाजों से शादी की। तीन बच्चे होने व शादी के 20 वर्ष बाद पति ने तलाक का आवेदन दिया। पत्नी ने प्रतिपरीक्षण में कहा कि वह परिवार में एक अच्छी पत्नी बहू व माँ रही है। पति ही झगड़ा करता था। उसका होटल का व्यवसाय है। कोर्ट ने बच्चों की बयान को महत्वपूर्ण माना है।
