गोल बाजार में कथित अवैध निर्माण पर पेश याचिका निराकृत
00 वैकल्पिक कानूनी उपाय हों तो , सीधे रिट अधिकार क्षेत्र का उपयोग नहीं
० याचिकाकर्ताओं को सक्षम न्यायालय में जाने की छूट
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने गोल बाजार में कथित अवैध निर्माण और सार्वजनिक रास्ते पर अतिक्रमण के मामले में दायर रिट याचिका का निराकरण करते हुए याचिकाकर्ताओं को नगर निगम अधिनियम, 1956 की धारा 307 के तहत सक्षम न्यायालय में जाने को कहा है।
मनीष कुमार अग्रवाल और प्रशांत मिश्रा ने निजी पक्षकार संजय दुबे के निर्माण के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए याचिका दायर की थी, इस पर 8 अक्टूबर 2026 को आदेश पारित किया गया* याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वार्ड क्रमांक 30, गोल बाजार में संजय दुबे द्वारा पुराने निर्माण में आग लगने की घटना के बाद आवश्यक अनुमति और स्वीकृत नक्शे के बिना नया निर्माण कराया जा रहा है* इससे सार्वजनिक रास्ते की चौड़ाई पहले की 10 से 15 फीट से घटकर लगभग 5 से 7 फीट रह गई है* इस रास्ते का उपयोग करीब 100 आवासीय परिवार करते हैं।*रास्ता संकरा होने से आवागमन प्रभावित हो रहा है और एंबुलेंस, दमकल जैसी आपातकालीन गाड़ियों का निकलना मुश्किल हो गया है*
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, उन्होंने कलेक्टर और नगर निगम आयुक्त से शिकायत की थी* इसके बाद नगर निगम ने संबंधित निर्माण के दस्तावेज, भवन अनुमति और स्वीकृत नक्शा प्रस्तुत करने के निर्देश दिए, लेकिन कथित अवैध निर्माण जारी रहा।
राज्य की ओर से उप शासकीय अधिवक्ता शोभित मिश्रा, नगर निगम के अधिकारियों की ओर से अधिवक्ता ए.एस. कछवाहा तथा संजय दुबे की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज परांजपे और अधिवक्ता मयंक गुप्ता ने पैरवी की* नगर निगम और निजी पक्षकार की ओर से याचिका की ग्राह्यता पर सवाल उठाते हुए कहा गया कि, विवाद निजी संपत्ति से जुड़ा है और इसके लिए नगर निगम अधिनियम की धारा 307(5) के तहत जिला न्यायालय में प्रभावी कानूनी उपाय उपलब्ध है* संजय दुबे की ओर से यह भी कहा गया कि, वह नया नहीं, बल्कि पुराने निर्माण का नवीनीकरण कर रहे हैं*
हाईकोर्ट ने कहा कि जब कानून के तहत प्रभावी वैकल्पिक उपाय उपलब्ध है, तब सामान्यतः सीधे रिट अधिकार क्षेत्र का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए* आदेश में दिलीप कौशल बनाम मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा गया कि, नगर निगम अधिनियम की धारा 307 के तहत कोई भी व्यक्ति कथित अवैध निर्माण के संबंध में जिला न्यायालय में निषेधाज्ञा की मांग कर सकता है* कोर्ट ने विवाद के गुण-दोष पर कोई अंतिम राय नहीं दी* इस आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका का निराकरण करते हुए याचिकाकर्ताओं को कानून के अनुसार सक्षम न्यायालय में जाने की छूट दी* कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उपलब्ध वैकल्पिक कानूनी उपाय का उपयोग किया जा सकता है।
