वाड्रफनगर के पूर्व सीईओ की एफआईआर रद्द करने पेश याचिका खारिज
बिलासपुर। हाईकोर्ट ने बलरामपुर-रामनुजगंज जिला के वाड्रफनगर जनपद पंचायत के पूर्व सीईओ के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने पेश याचिका को खारिज किया है। सीईओ के खिलाफ वाड्रफनगर बसंतपुर पुलिस ने फर्जी वर्क आर्डर जारी कर शासन को 30 लाख रूपये से अधिक का आर्थिक नुकसान पहुंचाने के आरोप में धारा 467, 468, 420, 409 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 7(1-13) के तहत अपराध दर्ज किया है। मामले में पुलिस ने न्यायालय में चालान पेश किया है।
याचिकाकर्ता श्रीमती ज्योति बबली कुजूर बलरामपुर-रामनुजगंज जिला में डिप्टी कलेक्टर के पद में पदस्थ की। कलेक्टर ने कार्य विभाजन कर उन्हें वाड्रफनगर में पदस्थ किया था। वाड्रफनगर जनपद पंचायत में मुख्य कार्यपालन अधिकारी के पद में पदस्थ रहने के दौरान वेदप्रकाश पांडेय ने उनके खिलाफ सरकारी धन के दुरूपयोग करने की शिकायत की। इस पर 30 अप्रैल 2020 को बसंतपुर पुलिस ने उनके खिलाफ जुर्म दर्ज कर मामले को विवेचना में लिया। इसके साथ ही विभागीय जांच भी कराई गई। सामान्य प्रशासन विधि एवं विधाई कार्य विभाग ने उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति प्रदान की। इस पर पुलिस ने न्यायालय में चालान पेश किया है। इसके खिलाफ उन्होंने याचिका पेश कर पुलिस चौकी-वाड्रफनगर पुलिस स्टेशन, बसंतपुर, जिला-बलरामपुर-रामानुजगंज में याचिकाकर्ता के खिलाफ धारा 467, 468, 420, 409 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7(1-13) के तहत दर्ज एफआईआर को रद्द करने, अतिरिक्त सचिव, छत्तीसगढ़ सरकार, कानून और विधायी कार्य विभाग, रायपुर द्बारा अभियोजन के लिए दी गई मंजूरी को रद्द करने की मांग की गई।
याचिका में कहा गया कि एसडीओ पी वाड्रफनगर से व्यक्तिगत दुश्मनी के कारण उनके खिलाफ झुठा मुकदमा दर्ज किया गया है। याचिकाकर्ता के खिलाफ विभागीय जांच की कार्यवाही शुरू की गई और पूरी विभागीय जांच पूरी होने के बाद, 28.07.2021 के आदेश से याचिकाकर्ता को आरोप से बरी कर दिया गया है। इस आधार पर याचिका को स्वीकार करने की मांग की गई थी।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा एवं जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डीबी में सुनवाई हुई। डीबी ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता की ओर से मुख्य दलील यह है कि पूरी क्रिमिनल कार्रवाई उस समय के एसडीओ पी ध्रुवेश जायसवाल के बीच पर्सनल दुश्मनी का नतीजा है, जिन्होंने कथित तौर पर उसे झूठा फंसाने की धमकी दी थी। रिकार्ड देखने से साफ है कि याचिकाकर्ता के खिलाफ वेदप्रकाश पांडेय शिकायत दर्ज कराई है। शुरू में सिर्फ सह-आरोपी अश्विनी तिवारी का नाम लिया गया था। जांच एजेंसी द्बारा एकत्र किए गए मटीरियल के आधार पर याचिकाकर्ता का शामिल होना सामने आया। याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोप गंभीर हैं। आरोप है कि एक पब्लिक सर्वेंट के तौर पर अपनी ड्यूटी निभाते हुए, याचिकाकर्ता ने दूसरे सरकारी अधिकारियों के साथ मिलकर 2017-2018 के दौरान जाली वर्क ऑर्डर तैयार करके 30,02,449/- रुपये का गबन किया, जिससे सरकारी खजाने को काफी नुकसान हुआ। अभियोजन के लिए मंज़ूरी देने के स्टेज पर, मंज़ूरी देने वाली अथॉरिटी को विस्तृत जांच करने या न्यायिक आदेश की तरह विस्तृत कारण रिकॉर्ड करने की ज़रूरत नहीं है। यह पर्याप्त है कि अथॉरिटी, मटेरियल के शुरुआती आकलन के आधार पर, संतुष्ट हो कि सरकारी कर्मचारी पर मुकदमा चलाया जाना चाहिए। मौजूदा मामले में, सरकारी फंड के गबन और जाली दस्तावेज़ बनाने के गंभीर आरोपों को देखते हुए, यह कोर्ट याचिकाकर्ता के खिलाफ प्रॉसिक्यूशन के लिए मंज़ूरी देने के राज्य के फैसले में कोई कमी नहीं पाता है। याचिकाकर्ता द्बारा उठाए गए तर्क मूल रूप से सबूतों के मूल्यांकन की मांग करते हैं, जो पूरी तरह से ट्रायल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है। कोर्ट ने मामले में हस्तक्ष्ोप से इंकार करते हुए याचिका को खारिज किया है।
