मूक बधिर होना अधिकृत सहायक नियुक्त करने का पर्याप्त आधार नहीं
00 निचली अदालत का आदेश बरकरार ,याचिका खारिज
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी महिला का जन्म से बहरा और बोलने में असमर्थ होना, मात्र इसी आधार पर उसे दीवानी मुकदमे में अपने हितों की रक्षा करने में अक्षम मानने और उसके पति को अगला मित्र नियुक्त करने का आधार नहीं हो सकता। न्यायमूर्ति सचिन सिंह राजपूत की एकलपीठ ने आबेदा बानो की याचिका खारिज करते हुए जगदलपुर की निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा।
मामले के अनुसार, आबेदा बानो के नाम ग्राम नेकटिसेमरा में 1.21 हेक्टेयर जमीन दर्ज है। राजेश सुराणा और सुनीता सुराणा ने दावा किया था कि 23 सितंबर 2010 को आबेदा ने 12.08 लाख रुपये में जमीन बेचने का इकरारनामा किया था और पांच लाख रुपये अग्रिम लिए थे। अनुबंध पूरा नहीं होने पर उन्होंने जमीन की रजिस्ट्री कराने और बिक्री विलेख को शून्य घोषित करने सहित अन्य राहत के लिए दीवानी मुकदमा दायर किया था।
आबेदा बानो ने दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 32 नियम 15 के तहत अपने पति मोहम्मद इलियास खत्री को अगला मित्र नियुक्त करने की मांग की थी। उनका तर्क था कि जन्म से बहरी और बोलने में असमर्थ होने के कारण वह न्यायिक कार्यवाही में अपने हितों की रक्षा नहीं कर सकतीं। जगदलपुर के प्रथम अपर जिला न्यायाधीश ने 4 अगस्त 2022 को आवेदन खारिज कर दिया था, जिसे उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि आबेदा लिखकर, इशारों से अथवा दुभाषिए की सहायता से अपनी बात रख सकती हैं और अपनी पसंद के वकील की सेवाएं भी ले सकती हैं। पति की मदद उपलब्ध होना अपने आप में उन्हें अगला मित्र नियुक्त करने का कानूनी आधार नहीं है। इसके लिए यह संतुष्टि जरूरी है कि संबंधित व्यक्ति वास्तव में मुकदमे में अपने हितों की रक्षा करने में असमर्थ है। एकलपीठ ने निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी।

kamlesh Sharma

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