पत्नी पर साथ छोड़ने का आरोप साबित नहीं कर सका पति, वैवाहिक अधिकारों की बहाली की अपील खारिज
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पत्नी को वापस साथ रहने के लिए बाध्य करने की मांग वाली पति की अपील खारिज कर दी है। जस्टिस पार्थ प्रतिम साहू और जस्टिस सुषमा सावंत की खंडपीठ ने कहा कि केवल पति की गवाही को चुनौती नहीं दिए जाने से उसका दावा अपने आप साबित नहीं हो जाता। हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत वैवाहिक अधिकारों की बहाली की डिक्री पाने के लिए पति को यह साबित करना होगा कि पत्नी बिना किसी उचित कारण के उससे अलग रह रही है। खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट, अंबिकापुर के 1 अप्रैल 2024 के फैसले को सही ठहराया।
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता की शादी 7 मई 2017 को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के जमलापुर गांव में हिंदू रीति-रिवाजों से हुई थी। 9 सितंबर 2019 को उनकी बेटी का जन्म हुआ। पति का आरोप था कि शादी के करीब एक साल बाद पत्नी छोटी-छोटी बातों पर विवाद करने लगी और मायके जाने की जिद करती थी। गर्भावस्था के दौरान जुलाई 2019 में वह मायके चली गई, जहां बेटी का जन्म हुआ। पति के अनुसार, बेटी के जन्म के बाद वह पत्नी और बच्ची को अपने घर ले आया, लेकिन 28 फरवरी 2020 को अन्नप्राशन समारोह के बाद पत्नी अगले दिन अपने भाई के साथ बेटी को लेकर मायके चली गई। इसके बाद उसके लौटने के प्रयास सफल नहीं हुए। पति ने पत्नी को वापस बुलाने के लिए हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की थी।
फैमिली कोर्ट ने 1 अप्रैल 2024 को पति की याचिका खारिज कर दी थी। इसके खिलाफ पति ने हाईकोर्ट में अपील की। पति के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट में उसकी गवाही और दस्तावेजों को चुनौती नहीं दी गई थी, इसके बावजूद उन्हें उचित महत्व नहीं दिया गया। वहीं, पत्नी की ओर से कहा गया कि फैमिली कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों का सही मूल्यांकन कर फैसला दिया है। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि पत्नी के एकतरफा रहने के बावजूद पति की ओर से पेश दस्तावेजों में ऐसे तथ्य थे, जिनसे उसके अलग रहने के पीछे उत्पीड़न की शिकायत का संकेत मिलता था।
खंडपीठ ने कहा कि वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए केवल आरोप लगाना पर्याप्त नहीं है। राहत मांगने वाले पक्ष को पहले यह साबित करना होता है कि दूसरा पक्ष बिना उचित कारण के अलग रह रहा है। पत्नी के खिलाफ एकतरफा कार्यवाही होने से पति का दावा स्वतः प्रमाणित नहीं हो जाता। फैमिली कोर्ट ने यह भी पाया था कि पति ने पत्नी को वापस लाने का वास्तविक प्रयास करने के बजाय करीब एक साल नौ महीने बाद मुकदमा दायर किया। रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री के आधार पर फैमिली कोर्ट के निष्कर्षों में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं मिला।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि पति के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी में लगाए गए आरोप और उसके बाद की आपराधिक कार्यवाही अंततः झूठी साबित होती है, तो वह कानून के अनुसार उचित उपाय अपना सकता है। हालांकि, केवल इस आधार पर पत्नी को उसके साथ रहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। पति वैवाहिक अधिकारों की बहाली की डिक्री पाने का अपना अधिकार साबित करने में असफल रहा। इस आधार पर खंडपीठ ने अपील खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। मामले में खर्च के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया गया।
