आय से अधिक संपत्ति मामले में पशु चिकित्सक की पुनरीक्षण याचिका खारिज
00 हाईकोर्ट ने कहा- आरोप तय करने के स्तर पर अभियोजन के साक्ष्यों की विस्तृत जांच जरूरी नहीं
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने आय से अधिक संपत्ति के मामले में जगदलपुर में पदस्थ सहायक पशु शल्य चिकित्सक डॉ. नारायण प्रसाद पांडे की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी है। न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की एकलपीठ ने विशेष न्यायाधीश, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, बस्तर द्वारा 30 नवंबर 2019 को आरोप तय करने के आदेश को बरकरार रखा। डॉ. पांडे ने अपने खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(ई) और 13(2) के तहत आरोप तय किए जाने को चुनौती दी थी।
अभियोजन के अनुसार, भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को सूचना मिली थी कि डॉ. पांडे ने अपनी सेवा अवधि में आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक चल-अचल संपत्ति अर्जित की है। प्रारंभिक जांच के बाद 3 मई 2005 को तलाशी वारंट लिया गया। अगले दिन जगदलपुर और रायपुर स्थित उनके आवासों की तलाशी में नकदी, सोने-चांदी के आभूषण और अन्य संपत्तियां मिलीं। जगदलपुर स्थित आवास से करीब 56.44 लाख रुपये तथा रायपुर स्थित आवास से करीब 1.40 लाख रुपये की संपत्ति मिलने का आकलन किया गया। इसके बाद 8 मई 2005 को भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो, रायपुर में अपराध दर्ज किया गया।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता किशोर भादुड़ी और अधिवक्ता हर्ष दवे ने तर्क दिया कि जांच पूरी करने और आरोपपत्र पेश करने में लगभग 13 वर्ष की देरी हुई, इसलिए आरोप तय करने का आदेश निरस्त किया जाना चाहिए। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि मकान सामान्य भविष्य निधि से लिए गए ऋण और सक्षम अधिकारियों की अनुमति के बाद खरीदे गए थे, जबकि डेयरी फार्म पत्नी के नाम पर था। राज्य की ओर से उप महाधिवक्ता संजीव पांडे ने पक्ष रखा।
हाईकोर्ट ने देरी के आधार पर आरोप निरस्त करने की दलील स्वीकार नहीं की। पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता पहले भी भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत एक अन्य मामले में दोषसिद्ध हुआ था, हालांकि हाईकोर्ट ने 15 मई 2026 को उसे संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोप तय करने के चरण में यह देखना होता है कि अभियोजन की सामग्री प्रथम दृष्टया अपराध का आधार बनती है या नहीं। इस स्तर पर साक्ष्यों की विस्तृत जांच कर यह तय करना आवश्यक नहीं है कि दोष अंततः साबित होगा या नहीं।
हाईकोर्ट ने माना कि जांच में जुटाई गई सामग्री को इतना कमजोर या असंभव नहीं कहा जा सकता कि आरोप तय करने के आदेश में हस्तक्षेप किया जाए। इसी आधार पर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी गई और विशेष न्यायालय का आदेश बरकरार रखा गया। पहले दिया गया अंतरिम संरक्षण भी समाप्त कर दिया गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियां केवल आरोप तय करने के आदेश की समीक्षा तक सीमित हैं और विचारण न्यायालय साक्ष्यों के आधार पर स्वतंत्र रूप से मामले का फैसला करेगा।

kamlesh Sharma

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