फर्जी पहचान बताकर संपत्ति में हक जताने की दोषसिद्धि बरकरार, 75 वर्षीय महिला की सजा अवधि घटाई
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मृतक महिला की पहचान अपनाकर संपत्ति में वारिसाना हक जताने के मामले में गणेशिया बाई की दोषसिद्धि बरकरार रखी है। हालांकि, घटना के करीब 35 साल बीतने और महिला की उम्र 75 वर्ष होने को ध्यान में रखते हुए अदालत ने उसकी सजा पहले से जेल में बिताई गई 16 दिन की अवधि तक सीमित कर दी। जस्टिस सुधीर कुमार की एकलपीठ ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए यह आदेश दिया।
मामले के अनुसार, बालोद जिले के डौंडीलोहारा निवासी गणेशिया बाई पर आरोप था कि उसने सुखबती की मृत बेटी राधा बाई की पहचान अपनाकर उनकी संपत्ति में वारिसाना हक जताया। अभियोजन के मुताबिक, राधा बाई का जन्म 6 नवंबर 1950 को हुआ था और जन्म के लगभग 15 दिन बाद ही उसकी मृत्यु हो गई थी। इसके बावजूद गणेशिया बाई ने वर्ष 1991-92 में नायब तहसीलदार की अदालत में राजस्व प्रकरण दायर कर सुखबती की वारिस के रूप में नामांतरण और बंटवारे की मांग की। आरोप था कि उसने स्वयं को राधा बाई बताते हुए दोनों नामों से पहचाने जाने का दावा किया। अन्य सह-आरोपियों ने भी राजस्व अधिकारियों के समक्ष उसकी पहचान राधा बाई के रूप में बताकर इस दावे का समर्थन किया था।
शिकायत के आधार पर डौंडीलोहारा थाने में अपराध दर्ज किया गया। जांच के बाद मामला अदालत पहुंचा, जहां अभियोजन ने पांच गवाहों के बयान दर्ज कराए और 15 दस्तावेज प्रस्तुत किए। विचारण न्यायालय ने गणेशिया बाई को भारतीय दंड संहिता की धारा 419 के तहत प्रतिरूपण द्वारा छल और धारा 193 के तहत झूठे साक्ष्य देने के अपराध में दोषी ठहराते हुए दोनों धाराओं में छह-छह महीने के कारावास तथा 500-500 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। दोनों सजाएं साथ-साथ चलनी थीं। प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, बालोद ने 18 जुलाई 2017 को अपील खारिज कर दोषसिद्धि और सजा बरकरार रखी थी।
इसके खिलाफ गणेशिया बाई ने हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की। जस्टिस सुधीर कुमार ने अभिलेखों में उपलब्ध मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद दोषसिद्धि को उचित माना। अदालत ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की दोनों धाराओं के तहत दी गई दोषसिद्धि में हस्तक्षेप का आधार नहीं है।
हालांकि, अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि घटना वर्ष 1991-92 की है और तब से लगभग 35 वर्ष बीत चुके हैं। याचिका दायर करते समय महिला की उम्र करीब 66 वर्ष थी और अब वह 75 वर्ष की है। अभिलेखों के अनुसार, वह 3 से 6 जुलाई 1994 तथा 18 से 29 जुलाई 2017 तक जेल में रही थी, यानी कुल 16 दिन। इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने सजा को पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित कर दिया। जमानत पर होने के कारण उसे आत्मसमर्पण करने की आवश्यकता नहीं होगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसके जमानत बंधपत्र छह महीने तक प्रभावी रहेंगे।

kamlesh Sharma

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