बेटी जन्म से ही बेटे की तरह पैतृक संपत्ति का सहदायिक बन जाती है-हाईकोर्ट

०० हाईकोर्ट ने पिता की संपत्ति पर बेटी को भी हकदार माना

बिलासपुर। बेटी जन्म से ही उसी तरह सहदायिक बन जाती है जैसे बेटा बनता है। मौखिक बंटवारे की दलील स्वीकार नहीं की जा सकती, क्योंकि कानून बंटवारे को तभी मान्यता देता है, जब वह या तो रजिस्ट्रेशन अधिनियम, 1908 के प्रावधानों के तहत विधिवत रजिस्टर्ड बंटवारे के विलेख द्बारा, या किसी सक्षम अदालत के फैसले द्बारा किया गया हो।

हिदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की संशोधित धारा 6 के तहत अधिकार 09.09.2005 से पहले जन्मी बेटी भी क्लेम कर सकती है, बशर्ते धारा 6(1) में दिए गए सेविग क्लॉज़ का पालन किया जाए, यानी कोई भी निपटान या हस्तांतरण, बंटवारा, या वसीयतनामा जो 20 दिसंबर, 2004 से पहले हुआ था, उस पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

याचिकाकर्ता अमरिका बाई पत्नी रंजीत लोधी उम्र लगभग 35 वर्ष निवासी ग्राम रामाटोला, तह.- डोंगरगढ़, जिला. राजनांदगांव सी.जी. ने पिता की संपत्ति पर बराबार हक दिलाए जाने सिविल सूट दायर की थी। सिविल न्यायालय से वाद खारिज होने पर उन्होंने हाईकोर्ट में अपील पेश की। जस्टिस विभु दत्त गुरू ने अपील को स्वीकार करते हुए अपने आदेश में कहा कि कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त बंटवारे के सबूत के अभाव में, वादी पैतृक संपत्ति में सह-मालिक बनी रहती है और बंटवारे और अलग कब्जे की मांग करने का हकदार है। बिना साबित हुए मौखिक बंटवारे के आधार पर ऐसे अधिकार से इनकार करना सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 100 के तहत हस्तक्षेप की आवश्यकता वाला एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल पैदा करता है। धनुक और हेमकुंवर बाई, जो अपीलकर्ता अमरिका बाई के माता-पिता हैं, के बीच शादी पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करके खत्म हो गई है, यह स्थापित कानून है कि ऐसे रिवाज का दावा करने वाले पक्ष पर यह साबित करने का बोझ होता है कि रिवाज शादी को खत्म करने की अनुमति देता है। इस मामले में, ऐसा कोई सबूत रिकॉर्ड पर नहीं रखा गया है। इस न्यायालय द्बारा तैयार किए गए कानून के महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर अपीलकर्ता के पक्ष में दिया जाता है। सिविल अदालत के विवादित फैसले और आदेश रद्द किया है। अपीलकर्ता कानून के अनुसार मुकदमे की संपत्ति में अपने कानूनी हिस्से की हकदार होगी।

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मामला यह है

अपीलकर्ता अमरिक बाई पिता धनूक लोधी के पिता दुखेल लोधी के पास 26.00 एकड़ ज़मीन थी। दुखेल की मौत के बाद, बंटवारे में पुश्तैनी प्रॉपर्टी में से, धनुक को 6.30 एकड़ ज़मीन मिली। उस पुश्तैनी प्रॉपर्टी से हुई इनकम से, धनुक ने रामटोला गाँव के आशाराम और दूसरों से 2.50 एकड़ जमीन खरीदी और उसके बाद अपनी पत्नी हेमकुंवर के साथ अपने भाइयों के जॉइंट फ़ैमिली से अलग रहने लगा। हेमकुंवर बाई और धनुक की शादी से, उन्हें दो बेटियाँ हुईं, जिनके नाम अमरीका बाई अपीलकर्ता और कचराबाई (अब मर चुकी हैं)। धनुक अपनी पत्नी हेमकुंवर के साथ आदतन मारपीट करता था। दोनों बेटियों की शादी के बाद, उसने हेमकुंवर बाई के साथ और ज़्यादा ज़ुल्म करना शुरू कर दिया और भगवतीबाई को अपनी पत्नी के तौर पर घर में ले आया। इसलिए, उनकी पहली पत्नी हेमकुंवर बाई ने कोर्ट में मेंटेनेंस के लिए एक एप्लीकेशन दी, जिसे मान लिया गया। हेमकुंवर बाई के मेंटेनेंस की कार्रवाई फाइल करने पर, धानुक ने अपनी दूसरी पत्नी भगवतीबाई के असर में आकर, पुश्तैनी प्रॉपर्टी में से 2.82 हेक्टेयर लगभग 5.50 एकड़ ज़मीन अपने बेटों अजय कुमार और माधव के नाम म्यूटेट करवा ली, जो भगवतीबाई से पैदा हुए थे, और अपने अलग अकाउंट में सिर्फ़ 1.016 हेक्टेयर लगभग 2.54 एकड़ ज़मीन ही रखी। इस बटवारा के खिलाफ अमरीका बाई ने वाद पेश की थी। ट्रायल कोर्ट ने, मुद्दों को तय करने के बाद और दोनों पार्टियों द्बारा पेश किए गए सबूतों और रिकॉर्ड में मौजूद चीज़ों पर ठीक से विचार करने के बाद, वादी द्बारा दायर केस को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि हिदू सक्सेशन एक्ट, 1956 (संक्षेप में ‘एक्ट, 1956’) के सेक्शन 6 के सब-सेक्शन (1) के प्रोविज़ो के अनुसार, 20 दिसंबर, 2004 (यानी 20 दिसंबर, 2005) से पहले किया गया कोई भी डिस्पोज़िशन या एलिएनेशन, जिसमें बंटवारा या वसीयतनामा डिस्पोज़िशन शामिल है, प्रभावित नहीं होगा या अमान्य नहीं किया जाएगा। इसके खिलाफ उसने अपील पेश की थी। हाईकोर्ट ने सिविल अदालत के आदेश को निरस्त किया है। धनूक ने पहली पत्नी हेमंकुमारी से तलाक लिए बिना दूसरी शादी की थी।

kamlesh Sharma

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