भिलाई में हथकड़ी लगाकर घुमाया व अपराध करना पाप है, पुलिस हमारा बाप है जैसे नारे लगवाए
०० हाईकोर्ट ने डीजीपी को स्मृति नगर चौकी एसएचओ सिद्बू के आचरण की जांच करने का निर्देश दिया
बिलासपुर। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा एवं जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डीबी ने कोहका भिलाई में मामूली विवाद के बाद एक पक्ष को अवैध हिरासत में लेने अनावश्यक हथकड़ी लगाने, सार्वजनिक रूप से परेड कराने, या मानसिक और शारीरिक अपमान पहुंचाने के खिलाफ पीड़ितों द्बारा पेश याचिका को गंभीरता से लिया है। मामले में डीबी ने पुलिस महानिदेशक को स्मृति नगर थाना सुपेला के एसएचओ गुरिंदर सिंह सिद्बू के आचरण की उचित स्तर पर जांच करने और यदि आवश्यक हो, तो कानून के अनुसार आवश्यक सुधारात्मक और अनुशासनात्मक उपाय करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि पुलिस महानिदेशक यह सुनिश्चित करेंगे कि एसएचओ गुरिंदर सिंह को सर्वोच्च न्यायालय के अर्नेश कुमार, सत्येंद्र कुमार एंटिल और डी.के. बसु (उपरोक्त) में दिए गए बाध्यकारी निर्देशों के बारे में औपचारिक रूप से संवेदनशील बनाया जाए और सलाह दी जाए, और उसके भविष्य के आचरण को प्रभावी पर्यवेक्षी निगरानी में रखा जाए। कोर्ट ने आगे कहा कि हिरासत में किसी भी तरह का दुर्व्यवहार या उत्पीड़न पूरी तरह से अस्वीकार्य है। इसलिए पुलिस को संवैधानिक आदेशों और बाध्यकारी न्यायिक मिसालों का सख्ती से पालन करने का निर्देश दिया जाता है, खासकर मामूली या छोटे-मोटे सार्वजनिक विवादों से जुड़े मामलों में। इन निर्देशों का उद्देश्य नागरिकों की गरिमा और स्वतंत्रता की रक्षा करना और अवैध हिरासत, अनावश्यक हथकड़ी लगाने, सार्वजनिक रूप से परेड कराने, या मानसिक और शारीरिक अपमान को रोकना है।
कोहका स्मृति नगर सुपेला भिलाई निवासी सुजीत साव 22 अक्टूबर 2025 को अपनी पत्नी दो बेटियों और बेटे के साथ रात 10 बजे सूर्या मॉल के पीवीआर में सिनेमा देखने गए थे। सीटिंग एरिया में घुसते समय याचिकाकर्ता की पत्नी का पैर थिएटर में बैठी अलका गुप्ता से टकरा गई। इस बात को लेकर दोनों पक्षों में हाथापाई हो गई। मामला मामूली था और इसमें कोई हिसा नहीं हुई। थिएटर के स्टाफ ने बीच-बचाव किया और पुलिस को बुलाया, जिसके बाद स्मृति नगर पुलिस स्टेशन के लोग मौके पर पहुंचे।
अलका गुप्ता ने जानबूझकर इस छोटी सी घटना को तोड़-मरोड़कर पेश किया, और इसे एक महिला की इज्जत को ठेस पहुंचाने वाले अपराध का झूठा रंग दिया।
अगले दिन, 23.10.2025 को, पिटीशनर्स को ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास के सामने पेश किया गया। ज्यूडिशियल ऑर्डर की खुलेआम अवहेलना करते हुए, पुलिस कर्मी फिर से पिटीशनर्स को पुलिस चौकी स्मृति नगर ले गए, उन्हें और टॉर्चर किया, उन्हें गैर-कानूनी तरीके से हथकड़ी पहनाई पिटीशनर्स, जिनका कोई क्रिमिनल रिकॉर्ड नहीं है और जो पढ़े-लिखे बिजनेसमैन हैं और जिनकी सोशल स्टैंडिग अच्छी है, उन्हें हथकड़ी पहनाकर पूरे शहर में घुमाया गया, और उनसे अपराध करना पाप है, पुलिस हमारा बाप है जैसे गंदे नारे लगवाए गए। इन गैर-कानूनी कामों के वीडियो जानबूझकर प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में फैलाए गए, जिससे पिटीशनर्स की इज्ज़त और रेप्युटेशन को बहुत नुकसान हुआ।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा एवं जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डीबी ने याचिकाकर्ता एवं शासन के पक्ष को सुनने के बाद अपने आदेश में कहा रिकार्ड पर मौजूद सामग्री, डीजीपी का हलफनामे इस पर दिए गए जवाब पर विचार करने बाद अदालत इस नतीजे में पहुंचा कि पुलिस अधिकारियों खासकर एसएचओ गुरिंवर सिंह व अन्य ने अपने कर्तव्यों के निर्वहन में उनके आचरण से संबंधित गंभीर आरोपों से जुड़ा है। जिसमें गैर-कानूनी गिरफ्तारी, कानूनी और न्यायिक सुरक्षा उपायों का पालन न करना, मेडिकल जांच में बहुत ज़्यादा देरी और याचिकाकर्ताओं की बेइज्जती का आरोप है, ये ऐसे मामले हैं जो भारत के संविधान के आर्टिकल 21 और 22 के मूल पर चोट करते हैं, जो हर नागरिक के जीवन, आज़ादी और सम्मान के मौलिक अधिकार की गारंटी देते हैं।
न्यायालय ने कार्रवाई के तरीके पर अपनी गंभीर चिता और कड़ी अस्वीकृति दर्ज कियस है जिसमें गुरिदर सिह सिद्धू, स्टेशन हाउस ऑफिसर, पुलिस चौकी स्मृति नगर, पुलिस स्टेशन- सुपेला, जिला- दुर्ग, ने काम किया है, जो पुलिस शक्तियों के प्रयोग में एक लापरवाह और जल्दबाजी वाला दृष्टिकोण है। जो संवैधानिक सुरक्षा उपायों और प्रक्रियात्मक नियमों की स्पष्ट अवहेलना है।
कोर्ट ने पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया है कि वे एसएचओ सिद्बू के आचरण की उचित स्तर पर जांच करें, और यदि आवश्यक हो, तो कानून के अनुसार आवश्यक सुधारात्मक और अनुशासनात्मक उपाय करें। पुलिस महानिदेशक यह भी सुनिश्चित करेंगे कि सिद्बू को सर्वोच्च न्यायालय के अर्नेश कुमार, सत्येंद्र कुमार एंटिल और डी.के. बसु (उपरोक्त) में दिए गए बाध्यकारी निर्देशों के बारे में औपचारिक रूप से संवेदनशील बनाया जाए और सलाह दी जाए, और उसके भविष्य के आचरण को प्रभावी पर्यवेक्षी निगरानी में रखा जाए। पुलिस महानिदेशक को यह भी निर्देश दिया जाता है कि वे अपने कमांड के तहत सभी इकाइयों को उचित स्थायी निर्देश जारी करें, जिसमें यह दोहराया जाए कि गिरफ्तारी, रिमांड या हिरासत में इलाज से संबंधित संवैधानिक या वैधानिक सुरक्षा उपायों से किसी भी विचलन पर सख्त विभागीय परिणाम होंगे, और पुलिस प्राधिकरण का प्रयोग संयम, जवाबदेही और कानून के शासन का सख्ती से पालन करते हुए किया जाना चाहिए।
